Breaking News in Hindi

कानून का दुरुपयोग अब अदालत ही रोके

हाल के वर्षों में भारत की न्यायपालिका और जांच एजेंसियों के बीच का संतुलन कानूनी और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का सबसे बड़ा केंद्र बन गया है। हाल ही में उमर खालिद के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपने ही एक पूर्व फैसले की आलोचना करना, और दूसरी तरफ दिल्ली दंगा मामलों में वर्षों बाद भी जांच का जारी रहना, देश की आपराधिक न्याय प्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े करता है।

इसके साथ ही, हेमंत सोरेन, अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और संजय सिंह जैसे प्रमुख राजनीतिक नेताओं की गिरफ्तारियों और बाद में अदालतों से मिली राहत ने इस बहस को और तेज कर दिया है कि क्या कानून की उचित प्रक्रिया का पालन हो रहा है या प्रक्रिया ही अपने आप में सजा बनती जा रही है। उमर खालिद और शरजील इमाम को साल 2020 के दिल्ली दंगों की कथित साजिश के आरोप में गैर-कानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत गिरफ्तार किया गया था।

यूएएपीए जैसे कड़े कानूनों में जमानत मिलना बेहद मुश्किल होता है, क्योंकि इसके प्रावधानों के तहत यदि पुलिस की चार्जशीट में प्रथम दृष्टया (प्राइमा फेसी) आरोप सही प्रतीत होते हैं, तो अदालतें जमानत देने से इनकार कर सकती हैं। इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपने ही एक पूर्व फैसले की आलोचना करना भारतीय न्यायशास्त्र (ज्यूरिस्प्रूडेंस) में एक ऐतिहासिक मोड़ है।

अक्सर देखा गया है कि वटाली फैसले जैसे पूर्व उदाहरणों के कारण निचली अदालतों और उच्च न्यायालयों के हाथ बंध जाते हैं, जहाँ वे चार्जशीट के साक्ष्यों की गहराई से जांच किए बिना जमानत खारिज कर देती हैं। सुप्रीम कोर्ट का यह आत्मनिरीक्षण इस बात का संकेत है कि देश की सर्वोच्च अदालत अब नागरिक स्वतंत्रताओं और व्यक्तिगत आजादी के प्रति अधिक संवेदनशील हो रही है।

अदालत का यह रुख स्पष्ट करता है कि किसी भी कड़े कानून का उपयोग नागरिकों के मौलिक अधिकारों को कुचलने के लिए नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर, इसी मामले में दिल्ली पुलिस की जांच का अब तक जारी रहना जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगाता है। छह साल से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी यदि जांच मुकम्मल नहीं हुई है और आरोपी बिना दोषसिद्धि के जेल में बंद हैं, तो यह न्याय के इस सिद्धांत के खिलाफ है कि न्याय में देरी, न्याय न मिलने के बराबर है। पिछले कुछ समय में देश ने विपक्ष के कई शीर्ष नेताओं की गिरफ्तारियां देखीं। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और सांसद संजय सिंह को केंद्रीय जांच एजेंसियों (ईडी और सीबीआई) द्वारा गिरफ्तार किया गया। इन गिरफ्तारियों को सरकार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति बताया, जबकि विपक्ष ने इसे राजनीतिक प्रतिशोध करार दिया।

लेकिन जब ये मामले अदालतों के सामने पहुंचे, तो न्यायिक टिप्पणियों ने जांच एजेंसियों के दावों की हवा निकाल दी। हेमंत सोरेन को झारखंड उच्च न्यायालय ने इस ठोस दलील पर जमानत दी कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप पहली नजर में साबित ही नहीं होते हैं। अदालत ने माना कि जिस जमीन के घोटाले में उन्हें फंसाया गया था, उस पर उनके सीधे स्वामित्व के पर्याप्त सबूत नहीं थे।

इससे भी बड़ा झटका तब लगा जब दिल्ली की निचली अदालत ने अरविंद केजरीवाल के खिलाफ मामले को यह कहते हुए व्यावहारिक रूप से खारिज करने की दिशा में कदम बढ़ाया कि उनके खिलाफ कोई ठोस साक्ष्य ही मौजूद नहीं है। धन शोधन निवारण अधिनियम जैसे कड़े कानून के तहत, जहाँ जमानत पाना लगभग असंभव माना जाता है, अदालतों द्वारा ऐसी टिप्पणियां करना यह दर्शाता है कि जांच एजेंसियां कई बार बिना किसी पुख्ता और अकाट्य सबूत के, महज बयानों और अनुमानों के आधार पर गिरफ्तारियां कर रही हैं।

इन तमाम मामलों को यदि एक सूत्र में पिरोया जाए, तो देश के सामने प्रक्रिया ही सजा है की एक खतरनाक प्रवृत्ति उभरती दिखती है। चाहे वह यूएएपीए के तहत बंद उमर खालिद हों या पीएमएलए के तहत गिरफ्तार किए गए राजनेता; सालों तक जेल में रखने के बाद जब अदालतें कहती हैं कि साक्ष्य अपर्याप्त हैं, तो उस व्यक्ति के जीवन, प्रतिष्ठा और समय की भरपाई कौन करेगा?

न्यायपालिका की हालिया सक्रियता और सख्त टिप्पणियों ने यह उम्मीद जगाई है कि कानून का राज राजनीतिक एजेंडे से ऊपर है। निचली अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक, न्यायाधीश अब जांच एजेंसियों से तीखे सवाल पूछ रहे हैं और साक्ष्यों की गुणवत्ता की कड़ाई से जांच कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट का अपने फैसलों की समीक्षा करना और निचली अदालतों द्वारा साक्ष्यों के अभाव में मामले खारिज करना इस बात का प्रमाण है कि भारतीय न्यायपालिका आज भी नागरिक अधिकारों की सबसे बड़ी रक्षक है।