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केंद्र और लेह प्रशासन ने रिहाई का जोरदार विरोध किया

सुप्रीम कोर्ट में कहा पूरी तरह सवस्थ है सोनम वांगचुक

  • एनएसए के तहत किया गया गिरफ्तार

  • सरकार को उनकी रिहाई से खतरा है

  • नियमित स्वास्थ्य जांच की गयी है

राष्ट्रीय खबर

नई दिल्ली: केंद्र सरकार और लेह प्रशासन ने बुधवार को उच्चतम न्यायालय को सूचित किया कि उन्होंने हिरासत में लिए गए जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को स्वास्थ्य आधार पर रिहा न करने का निर्णय लिया है। सरकार का तर्क है कि वांगचुक पूरी तरह स्वस्थ हैं, इसलिए चिकित्सा आधार पर उनकी रिहाई का कोई औचित्य नहीं बनता। पिछले सप्ताह न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति पी.बी. वराले की पीठ ने जेल में वांगचुक के गिरते स्वास्थ्य की खबरों पर चिंता व्यक्त की थी। कोर्ट ने सरकार से मानवीय आधार पर उनकी हिरासत की समीक्षा करने का आग्रह किया था।

आज की सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया, हमने वांगचुक के स्वास्थ्य की 24 बार समय-समय पर जांच की है। वे पूरी तरह फिट और स्वस्थ हैं। उन्हें पाचन संबंधी कुछ मामूली समस्या थी, जिसका उपचार किया जा रहा है। स्थिति चिंताजनक कतई नहीं है।

मेहता ने स्पष्ट किया कि नजरबंदी का आदेश जिन आधारों पर दिया गया था, वे अभी भी प्रभावी हैं और केवल स्वास्थ्य का बहाना बनाकर उन्हें रिहा करना संभव या वांछनीय नहीं होगा। सोनम वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत में लिया गया है। यह कार्रवाई सितंबर 2025 में लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा और संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग को लेकर हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद की गई थी।

सरकार ने अदालत में वांगचुक पर अत्यंत गंभीर आरोप लगाए हैं। केंद्र का दावा है कि वांगचुक लद्दाख में नेपाल और बांग्लादेश जैसी हिंसक क्रांतियों जैसी स्थिति पैदा करना चाहते थे। सरकार के अनुसार, वांगचुक केंद्र सरकार को वे कहकर संबोधित करते हैं, जो हम और वे की भावना पैदा करता है। सॉलिसिटर जनरल ने तर्क दिया कि यह अलगाववादी प्रवृत्ति को दर्शाता है क्योंकि हम सभी भारतीय हैं। प्रशासन ने आरोप लगाया कि वांगचुक जेन-जी यानी युवाओं को गृहयुद्ध के लिए उकसा रहे थे।

वांगचुक की पत्नी गीतांजलि जे. आंगमो की ओर से दायर याचिका में इस नजरबंदी को चुनौती दी गई है। उनके वकील का तर्क है कि सरकार की आलोचना करना और शांतिपूर्ण विरोध करना एक लोकतांत्रिक अधिकार है। उनके अनुसार, सरकार के प्रति असंतोष व्यक्त करने का अर्थ यह नहीं है कि वह राज्य की सुरक्षा के लिए खतरा हैं। फिलहाल, सरकार की ओर से दलीलें जारी हैं और एडिशनल सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज अधिकारियों की ओर से पक्ष रख रहे हैं। यह मामला लद्दाख की राजनीतिक स्वायत्तता और नागरिक अधिकारों के बीच एक महत्वपूर्ण कानूनी लड़ाई बन गया है।