दस साल पुरानी योजना को फिर से जीवित करने की तैयारी
कागज के नोट जल्द खराब हो जाते हैं
छपाई के बाद नष्ट करने में भी खर्च है
प्लास्टिक नोट के लिए एटीएम में व्यवस्था
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः भारतीय रिजर्व बैंक ने पिछले कुछ वर्षों में मुद्रा नोटों की मांग में आई भारी तेजी को देखते हुए देश में चलन के लिए पॉलीमर (प्लास्टिक) के बैंक नोट छापने के विचार को एक बार फिर से जीवित कर दिया है। इस घटनाक्रम से वाकिफ सूत्रों के अनुसार, केंद्रीय बैंक की पटना और मुंबई में आयोजित पिछली दो बोर्ड बैठकों में पॉलीमर या प्लास्टिक के नोट पेश करने के मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की गई थी। यह निर्णय इन नोटों की कम उत्पादन लागत और लंबी उम्र जैसे प्रत्यक्ष फायदों को देखते हुए लिया गया है। उम्मीद है कि आम जनता के उपयोग के लिए प्लास्टिक के बैंक नोटों से जुड़ी एक पायलट परियोजना की घोषणा जल्द ही की जा सकती है।
बोर्ड की चर्चाओं से परिचित एक सूत्र ने बताया, वर्तमान में उपयोग किए जा रहे कागजी नोटों की तुलना में इन नोटों की उत्पादन लागत में स्पष्ट लाभ हैं। इसके अलावा, स्वचालित टेलर मशीनों को भी पॉलीमर-आधारित नोटों को निकालने के लिए सक्षम बनाया जाएगा। अब हमारे पास ऐसा करने के लिए सभी जरूरी संसाधन मौजूद हैं।
आरबीआई ने अपनी वित्तीय वर्ष 2024-25 की वार्षिक रिपोर्ट में बताया था कि कागजी बैंक नोटों की छपाई पर खर्च पिछले वर्ष के 5,101.4 करोड़ से बढ़कर 6,372.8 करोड़ रुपये हो गया, जिसका मुख्य कारण नोटों की छपाई के ऑर्डर में हुई वृद्धि थी। उत्पादन लागत के साथ-साथ नोटों की उम्र बढ़ाना भी एक बड़ा कारण है, क्योंकि कटे-फटे और गंदे नोटों को नष्ट करने का आंकड़ा लगातार ऊंचा बना हुआ है। आंकड़ों के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2025 में 23.8 अरब गंदे नोटों को नष्ट किया गया, जो पिछले वर्ष के 21.24 अरब नोटों से 12.3 प्रतिशत अधिक है। इनमें सबसे ज्यादा संख्या 500 रुपये के नोटों की थी, जिसके बाद 100 के नोट शामिल थे। दूसरी ओर, डिजिटल भुगतानों में लगातार हो रही वृद्धि के बावजूद देश में नकदी की मांग बनी हुई है। 15 मई तक चलन में मौजूद कुल मुद्रा सालाना आधार पर 11.5 प्रतिशत बढ़कर 42.86 ट्रिलियन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई।
सूत्रों ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में 10 और 20 जैसे छोटे मूल्यवर्ग के नोटों की भारी मांग देखी गई है। हालांकि, कुल नोटों के मूल्य के लिहाज से इनका हिस्सा काफी कम रहा है। उदाहरण के लिए, कुल मूल्य में 10 के नोटों की हिस्सेदारी पिछले दो वर्षों में केवल 0.7 प्रतिशत और 20 रुपये के नोटों की हिस्सेदारी महज 0.8 प्रतिशत रही है। केंद्रीय बैंक ने सिक्कों के उपयोग को लोकप्रिय बनाने का भी प्रयास किया, लेकिन उसे मनमुताबिक सफलता नहीं मिली।
एक दशक पुराना इतिहास और वैश्विक स्थिति इससे पहले साल 2012 में तत्कालीन संप्रदाय सरकार ने परीक्षण के तौर पर पांच शहरों में 10 के एक अरब प्लास्टिक नोट चलाने का फैसला किया था। तब सरकार ने स्पष्ट किया था कि इसका मुख्य उद्देश्य नोटों की उम्र बढ़ाना था, न कि जाली नोटों से लड़ना। हालांकि, तकनीकी चुनौतियों के कारण तब इस योजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था।