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साख की परीक्षा में फेल, जिम्मेदारी से भागती राजनीति

भारत की शिक्षा व्यवस्था इस समय अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। देश की दो सबसे प्रतिष्ठित और महत्वपूर्ण परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर उठे गंभीर सवालों ने न केवल लाखों छात्रों के भविष्य को अधर में लटका दिया है, बल्कि हमारी पूरी प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्था की खोखली हो चुकी साख को भी उजागर कर दिया है।

पहले नीट यूजी 2026 के पेपर लीक का मामला सामने आया और फिर केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के परीक्षा परिणामों में बड़ी विसंगतियां और गलतियां उजागर हुईं। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दुर्भाग्यपूर्ण और निराशाजनक पहलू यह रहा कि देश के भविष्य से जुड़े इतने संवेदनशील मुद्दों पर भी जवाबदेही तय करने के बजाय हमेशा की तरह राजनीति हावी हो गई। जैसे ही पेपर लीक और परिणामों में गड़बड़ी का मुद्दा गर्माया, पूरा घटनाक्रम एक गंभीर प्रशासनिक सुधार की बहस से भटककर तीखी राजनीतिक बयानबाजी और ब्लेम गेम में तब्दील हो गया।

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ विपक्ष ने मोर्चा खोल दिया और उनके इस्तीफे की मांग को लेकर सड़कों से लेकर संसद तक हंगामा शुरू हो गया। विपक्षी दलों, विशेषकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी के तीखे बयानों ने राजनीतिक पारे को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया। वहीं दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी और सरकार के नुमाइंदे पूरी ताकत से अपने मंत्री और व्यवस्था के बचाव में उतर आए।

राजनीति के इस शोर-शराबे में जो सबसे जरूरी चीज गायब रही, वह थी—जिम्मेदारी। सत्तापक्ष और विपक्ष, दोनों में से किसी ने भी इस बात पर गहराई से आत्ममंथन नहीं किया कि आखिर हमारी परीक्षा प्रणाली इतनी कमजोर कैसे हो गई कि बार-बार पेपर लीक माफिया युवाओं के सपनों को कुचलने में कामयाब हो जाते हैं?

किसी भी शीर्ष अधिकारी या नीति-निर्माता ने इस ऐतिहासिक विफलता की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए देश के सामने सच स्वीकार करने का साहस नहीं दिखाया। जब भी ऐसी राष्ट्रीय आपदाएं आती हैं, तो उम्मीद की जाती है कि पूरा देश और सभी राजनीतिक दल दलगत राजनीति से ऊपर उठकर समाधान की तलाश करेंगे।

लेकिन हमारे लोकतंत्र की मौजूदा त्रासदी यह है कि हर समस्या को केवल चुनाव और वोटों के चश्मे से देखा जाता है। विपक्ष के लिए यह सरकार को घेरने का एक मुफीद मौका बन गया, तो सरकार के लिए यह केवल एक छवि प्रबंधन की चुनौती बनकर रह गया। मंत्री के इस्तीफे की मांग करना विपक्ष का लोकतांत्रिक अधिकार हो सकता है, लेकिन क्या केवल एक व्यक्ति के इस्तीफे से यह सड़ी-गली व्यवस्था रातों-रात ठीक हो जाएगी?

पेपर लीक का जाल किसी एक सरकार या एक कार्यकाल तक सीमित नहीं है; यह एक गहरा क्रॉनिक मर्ज है जो देश के कई राज्यों में और कई स्तरों पर अपनी जड़ें जमा चुका है। दूसरी तरफ, सरकार का रवैया भी बेहद निराशाजनक रहा। शुरुआत में कमियों को छुपाने या उन्हें छिटपुट घटना बताने की कोशिश की गई। जब पानी सिर से ऊपर चला गया, तब जाकर जांच और कमेटियों के गठन का पारंपरिक रास्ता चुना गया।

लेकिन सवाल यह है कि जब तक जांच एजेंसियां किसी निष्कर्ष पर पहुंचेंगी, तब तक उन लाखों छात्रों के मानसिक तनाव, उनके माता-पिता की गाढ़ी कमाई और उनके बहुमूल्य समय के नुकसान की भरपाई कौन करेगा? नीट जैसी देश की सबसे बड़ी चिकित्सा प्रवेश परीक्षा का पेपर लीक होना सिर्फ एक प्रशासनिक विफलता नहीं है, बल्कि यह देश के सुरक्षा और तकनीकी तंत्र पर भी एक बड़ा तमाचा है।

जब हम डिजिटल इंडिया और अभेद्य सुरक्षा का दावा करते हैं, तब एक पेपर का लीक हो जाना यह दर्शाता है कि व्यवस्था के भीतर ही बैठे कुछ विभीषण इस पूरी प्रणाली को दीमक की तरह चाट रहे हैं। वहीं दूसरी ओर, सीबीएसई के परीक्षा परिणामों में आई गलतियों ने आग में घी डालने का काम किया है।

सीबीएसई को देश का सबसे विश्वसनीय स्कूल बोर्ड माना जाता है, जिसके मूल्यांकन पर छात्र आंख मूंदकर भरोसा करते हैं। यदि इस स्तर पर भी अंकों की गणना, मॉडरेशन या परिणाम जारी करने में तकनीकी और मानवीय चूक हो रही है, तो यह साफ है कि हमारी संस्थाएं अति-आत्मविश्वास और लापरवाही का शिकार हो चुकी हैं।

इन गलतियों के कारण कई योग्य छात्र दौड़ में पीछे छूट जाते हैं, और उनके पास पुनर्मूल्यांकन की लंबी और खर्चीली प्रक्रिया से गुजरने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता। छात्रों का आक्रोश और अवसाद आज सड़कों पर साफ देखा जा सकता है। यह देश के उस कार्यबल का अपमान है जिसके दम पर हम विश्व गुरु बनने का सपना देख रहे हैं। यदि देश के युवा अपनी मेहनत, और अपनी परीक्षाओं की शुचिता पर से भरोसा खो देंगे, तो राष्ट्र निर्माण की पूरी नींव ही कमजोर हो जाएगी। देश के नौनिहालों के भविष्य की बलि चढ़ाकर खेली जाने वाली राजनीति को इतिहास कभी माफ नहीं करेगा।