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कहां चल दिये, इधर तो आओ.. .. .. .. .. ..

 

देश में इस वक्त डबल इंजन की नहीं, बल्कि डबल हीटर की सरकार चल रही है। एक तरफ आसमान से सूरज देवता 50 डिग्री वाली आग बरसा रहे हैं, तो दूसरी तरफ सियासत के गलियारों से ऐसी गर्म हवाएं चल रही हैं कि आम आदमी बिना चाय पिए ही खौल रहा है। लेकिन घबराइए मत, हमारे देश का लोकतंत्र इतना मजबूत है कि चाहे पेपर लीक हो जाए या जेब खाली, हमारी मुस्कुराहट कभी लीक नहीं होती।

शुरुआत अंतरराष्ट्रीय स्तर की एक गुस्ताखी से करते हैं। नॉर्वे की एक महिला पत्रकार ने हमारे मुखिया से वो सवाल पूछ लिया, जिससे वो 2014 से उसी तरह बच रहे हैं जैसे कोई बच्चा कड़वी दवा से बचता है। अब इन विदेशी पत्रकारों को कौन समझाए कि हमारे यहां प्रेस कॉन्फ्रेंस का मतलब सवाल-जवाब नहीं, बल्कि वन-वे ट्रैफिक होता है! खैर, पत्रकार ने सवाल दागा और हमारे साहब ने उसे वैसे ही इग्नोर किया जैसे हम लोग यूट्यूब पर आने वाले पांच सेकंड के विज्ञापन को करते हैं। आपदा को अवसर में बदलना इसी को तो कहते हैं!

उधर, देश के नौनिहालों के भविष्य के साथ नीट एंड क्लीन खेल चल रहा है। नीट यूजी पेपर लीक मामले में शिक्षा मंत्री जी और एनटीए के प्रमुख के बीच की जुगलबंदी देखने लायक है। दोनों के बयान इतने परस्पर विरोधी हैं कि ऐसा लगता है जैसे दोनों अलग-अलग देशों के शिक्षा तंत्र की बात कर रहे हों। एक कह रहे हैं, सब चंगा सी, कुछ लीक नहीं हुआ, तो दूसरे धीरे से फुसफुसा रहे हैं, थोड़ा सा तो हुआ है भाई! अब छात्र समझ नहीं पा रहे हैं कि वे अगली परीक्षा की तैयारी करें या फिर यह पता लगाने के लिए जासूसी कोर्स ज्वाइन करें कि इस बार पेपर किस खिड़की से उड़ेगा। हर कोई अपनी अपनी जिम्मेदारी से भागता नजर आ रहा है।

इसी बात पर वर्ष 1968 में बनी फिल्म झूक गया आसमान का एक गीत याद आने लगा है। इस गीत को लिखा था हसरत जयपुरी ने और संगीत में ढाला था शंकर जयकिशन ने। इसे मोहम्मद रफी ने अपना स्वर दिया था। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।

कहाँ चल दिए? इधर तो आओ

मेरे दिल को ना ठुकराओ

भोले सितमगर मान भी जाओ

मान भी जाओ, मान भी जाओ

कहाँ चल दिए? इधर तो आओ

मेरे दिल को ना ठुकराओ

भोले सितमगर मान भी जाओ

मान भी जाओ, मान भी जाओ

हमारी जान जाती है, अदा कहते हो तुम इसको

हमारी जान जाती है, अदा कहते हो तुम इसको

बड़े मासूम क़ातिल हो, सज़ा देते हो तुम मुझको

बड़े मासूम क़ातिल हो, सज़ा देते हो तुम मुझको

कहाँ चल दिए? इधर तो आओ

मेरे दिल को ना ठुकराओ

भोले सितमगर मान भी जाओ

इस चौतरफा गर्मी के बीच, सरकार को लगा कि जनता को थोड़ी और ऊर्जा की जरूरत है, इसलिए ईंधन के दामों में तीसरी बार बढ़ोतरी कर दी गई। तर्क बेहद सीधा और तार्किक है—जब गाड़ियां खड़ी रहेंगी, तो प्रदूषण कम होगा और पर्यावरण बचेगा! ईंधन महंगा करके सरकार असल में हमें पैदल चलने की आदत डाल रही है ताकि हमारा स्वास्थ्य ठीक रहे। इसे कहते हैं दूरदर्शी सोच।

इसी बीच, राहुल गांधी हाथ में माइक थामे भविष्यवक्ता की मुद्रा में आ गए हैं। वे बार-बार चेतावनी दे रहे हैं कि देश में एक बड़ा आर्थिक तूफान आने वाला है। अब जनता असमंजस में है कि इस तूफान से बचने के लिए वे रेनकोट खरीदें या फिर अपने खाली बैंक खातों को ताला लगाएं। जनता सोच रही है कि जब जेब में पैसे ही नहीं बचे, तो तूफान आकर लूटेगा क्या? खाली जेब में तो हवा भी यू-टर्न ले लेती है!

दक्षिण से तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी साहब की अपनी अलग ही राग चल रही है। उन्होंने मांग कर दी है कि तुरंत संसद का विशेष सत्र बुलाया जाए और इसी फॉर्मेट में महिला आरक्षण लागू किया जाए। वैसे बात तो सही है, जब देश में हर चीज इंस्टेंट हो रही है—इंस्टेंट नूडल्स, इंस्टेंट पेपर लीक—तो फिर महिला आरक्षण में देरी क्यों?

इनसे अलग अब राजनीतिक दलों पर इंटरनेटी तेलचट्टों का आतंक है। पता नहीं क्यों अनेक लोग इससे भयभीत हैं। घोषणापत्र भी अनेक लोगों को परेशान करने वाला है। कुल मिलाकर स्थिति यह है कि देश में तापमान और परेशानियां दोनों रिकॉर्ड तोड़ रहे हैं। लेकिन चिंता की कोई बात नहीं है। मौसम विभाग ने कहा है कि जल्द ही मानसून आएगा और सब कुछ ठंडा कर देगा। अब देखना यह है कि मानसून पहले आता है या व्यवस्था में सुधार। तब तक के लिए एसी चालू रखिए (अगर बिजली बिल भरने की औकात हो तो), नींबू पानी पीजिए और टीवी पर चल रहे इस महा-व्यंग्य का आनंद लीजिए!