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आम आदमी सोच रहा है चुनाव है या युद्ध

चुनाव आयोग के निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव की दावेदारी

  • चौबीस सौ से अधिक कंपनियां हैं

  • ऐसी हालत तो युद्ध जैसी दिखती है

  • आम जनजीवन बाधित होने लगा है

राष्ट्रीय खबर

कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के लिए चुनाव आयोग द्वारा की गई अभूतপূর্ব सुरक्षा व्यवस्था अब विवादों के घेरे में है। आयोग ने पहले चरण के मतदान से पूर्व राज्य में 2,407 कंपनियां तैनात करने का जो निर्णय लिया है, उसे आम जनता और नागरिक समाज का एक बड़ा वर्ग संदेह और असहजता की दृष्टि से देख रहा है। लगभग ढाई लाख केंद्रीय सुरक्षाकर्मियों की यह मौजूदगी बंगाल के शांतिप्रिय नागरिकों के मन में सुरक्षा के बजाय निगरानी और दमन का भाव पैदा कर रही है।

अति-सुरक्षा से असुरक्षा का बोध आम लोगों का मानना है कि इतनी विशाल सेना की तैनाती बंगाल की छवि को एक युद्ध क्षेत्र के रूप में पेश कर रही है। कोलकाता और जिलों की गलियों में भारी हथियारों से लैस जवानों का निरंतर फ्लैग मार्च आम आदमी के सामान्य जीवन में खलल डाल रहा है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि कश्मीर या मणिपुर जैसे अशांत क्षेत्रों के बराबर सुरक्षा बल तैनात करना राज्य की लोकतांत्रिक गरिमा का अपमान है। क्या एक स्वतंत्र देश में वोट डालने के लिए सेना जैसी घेराबंदी अनिवार्य है? यह सवाल आज बंगाल के चाय के ठिकानों से लेकर बुद्धिजीवियों के बीच चर्चा का मुख्य विषय बना हुआ है।

अविश्वास और मनोवैज्ञानिक दबाव सुरक्षा के नाम पर की गई यह किलेबंदी मतदाताओं पर एक मनोवैज्ञानिक दबाव भी बना रही है। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, जहाँ लोग सहज होकर मतदान केंद्रों तक जाते थे, अब भारी वर्दीधारी जवानों की उपस्थिति से डरे हुए हैं। नागरिक अधिकार संगठनों का आरोप है कि केंद्रीय बलों की इतनी अधिक संख्या मतदाताओं को प्रोत्साहित करने के बजाय उन्हें मतदान केंद्रों से दूर रख सकती है। लोगों के मन में यह आशंका घर कर गई है कि क्या उनकी निजता और चुनावी स्वतंत्रता इस भारी सुरक्षा के नीचे दब जाएगी?

विपक्ष और स्थानीय पुलिस की भूमिका विपक्षी दलों और स्थानीय प्रशासन के एक वर्ग का तर्क है कि चुनाव आयोग ने राज्य पुलिस की क्षमता पर अविश्वास जताते हुए इस विशाल बल को थोपा है। यह न केवल राज्य के संघीय ढांचे पर प्रहार है, बल्कि सार्वजनिक धन की भारी बर्बादी भी है। लोगों का सवाल है कि यदि प्रशासन वास्तव में निष्पक्ष चुनाव चाहता है, तो उसे लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करना चाहिए, न कि बूथों को सेना की छावनी में बदलना चाहिए।

जैसे-जैसे 23 अप्रैल की तारीख नजदीक आ रही है, बंगाल में यह बहस तेज होती जा रही है कि क्या लोकतंत्र को केवल बंदूकों के साये में ही सुरक्षित रखा जा सकता है?