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एक मिनट की कीमत ढाई लाख हमारी जेब से

करदाताओं की गाढ़ी कमाई और संसद का गणित

  • हर आम आदमी पैसा चुका रहा

  • हंगामा होने पर भी खर्च कम नहीं

  • सारा तामझाम जनता के पैसे पर

राष्ट्रीय खबर

नई दिल्ली: भारतीय लोकतंत्र के मंदिर, संसद की कार्यवाही का संचालन न केवल विधायी दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि आर्थिक रूप से भी यह एक अत्यंत खर्चीली प्रक्रिया है। हालिया विश्लेषणों के अनुसार, संसद के एक सत्र को चलाने में होने वाला व्यय इतना अधिक है कि सदन की कार्यवाही का हर एक मिनट देश के खजाने पर भारी पड़ता है। जब सदन में बहस के बजाय हंगामा होता है या कार्यवाही स्थगित करनी पड़ती है, तो यह सीधे तौर पर आम जनता की जेब पर प्रहार है।

खर्च का चौंकाने वाला विश्लेषण संसद के दोनों सदनों—लोकसभा और राज्यसभा—के संचालन पर होने वाले खर्च का यदि मिनटों और घंटों में विभाजन किया जाए, तो आंकड़े हैरान करने वाले हैं। आधिकारिक अनुमानों और पूर्व के संसदीय सत्रों के डेटा के आधार पर, संसद सत्र चलाने का खर्च कुछ इस प्रकार बैठता है। 2.5 लाख रुपये प्रति मिनट की दर से सदन की कार्यवाही जैसे ही शुरू होती है, हर गुजरते साठ सेकंड के साथ देश के ढाई लाख रुपये खर्च हो जाते हैं।

एक घंटे की चर्चा या विधायी कार्य के लिए सरकारी खजाने से लगभग डेढ़ करोड़ रुपये का प्रावधान करना पड़ता है। 9 करोड़ से 15 करोड़ प्रति दिन होता है। सामान्यतः एक दिन में छह घंटे की सक्रिय कार्यवाही का खर्च 9 करोड़ रुपये आता है। यदि विशेष परिस्थितियों में सत्र देर रात तक चले, तो यह आंकड़ा 15 करोड़ रुपये प्रतिदिन तक पहुँच जाता है।

खर्च में क्या-क्या शामिल है? इस भारी-भरकम राशि में सांसदों के वेतन, भत्ते, यात्रा खर्च, आवास और स्वास्थ्य सुविधाएं शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, संसद भवन की कड़ी सुरक्षा, सचिवालय के हजारों कर्मचारियों का वेतन, कागजी कार्यवाही, प्रकाशन, और तकनीकी बुनियादी ढांचे का रखरखाव भी इसी व्यय का हिस्सा है।

करदाताओं का पैसा और नैतिक जवाबदेही सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इस विशाल धनराशि का स्रोत कोई और नहीं, बल्कि देश का आम करदाता है। एक मजदूर जो अपनी मजदूरी से सामान खरीदकर अप्रत्यक्ष कर (जीएसटी) देता है और एक वेतनभोगी जो अपनी आय से इनकम टैक्स भरता है, उन सभी के पैसों से यह लोकतंत्र का पहिया घूमता है।

हाल के वर्षों में संसद की उत्पादकता में उतार-चढ़ाव को लेकर चिंता जताई गई है। जब महत्वपूर्ण विधेयकों पर सार्थक चर्चा के बजाय शोर-शराबे के कारण सदन स्थगित होता है, तो वह शून्य काल देश को करोड़ों की आर्थिक चोट पहुँचाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि सांसदों की यह नैतिक जिम्मेदारी है कि वे सदन के समय का सदुपयोग करें, क्योंकि हर सेकंड के पीछे देश के अंतिम व्यक्ति का पसीना लगा होता है।