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चंडीगढ़ और मोहाली के अस्पताल में पूर्व सैनिकों के नाम पर घोटाला

सीबीआई ने मामला पकड़ा और दर्ज की एफआईआर

राष्ट्रीय खबर

चंडीगढ़: केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने पूर्व सैनिकों की स्वास्थ्य योजना को निशाना बनाकर किए जा रहे एक बड़े संगठित स्वास्थ्य सेवा भ्रष्टाचार का भंडाफोड़ किया है। जांच एजेंसी ने चंडीगढ़ और मोहाली के कई प्रतिष्ठित सुपर-स्पेशियलिटी अस्पतालों के डॉक्टरों और हेल्थकेयर फर्म के निदेशकों के खिलाफ मामला दर्ज किया है। इन पर फर्जी मेडिकल क्लेम के जरिए सरकारी धन की हेराफेरी करने का गंभीर आरोप है।

सीबीआई की ओर से दर्ज की गई एफआईआर में मेसर्स मंथन हेल्थ केयर (सेक्टर 38, चंडीगढ़) के निदेशकों डॉ. विकास शर्मा और डॉ. रिम्पल गुप्ता को मुख्य आरोपी बनाया गया है। इसके अलावा, धरम हॉस्पिटल प्राइवेट लिमिटेड (सेक्टर 15, चंडीगढ़), केयर पार्टनर हार्ट सेंटर (सेक्टर 19, चंडीगढ़) और कई बिल क्लर्कों के नाम भी शामिल हैं। रिपोर्ट के अनुसार, मोहाली के अमर हॉस्पिटल, शाल्बी हॉस्पिटल, 1एच प्लस मेड पार्क हॉस्पिटल और चंडीगढ़ के ईडन क्रिटिकल केयर हॉस्पिटल की भूमिका की भी गहन जांच की जाएगी।

जांच में सामने आया है कि यह धोखाधड़ी 2018 से 2026 के बीच बड़े पैमाने पर की गई। घोटाले के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

मंथन हेल्थ केयर, जो ईसीएचएस के पैनल में शामिल नहीं था, वह धरम हॉस्पिटल के साथ मिलीभगत कर रहा था। धरम हॉस्पिटल के आधिकारिक स्टैम्प, लेटरहेड और डिजिटल सिग्नेचर का उपयोग मंथन के परिसर से ही किया जा रहा था।

फर्जी दस्तावेज: इमरजेंसी एडमिशन लेटर, डिस्चार्ज समरी और पैथोलॉजी रिपोर्ट बड़े पैमाने पर जाली बनाई गईं। कई डॉक्टरों के हस्ताक्षर भी फर्जी पाए गए। बिचौलियों के जरिए पूर्व सैनिकों (लाभार्थियों) को चुनकर विशिष्ट अस्पतालों में भेजा जाता था। बिना किसी ठोस चिकित्सकीय आधार के उन्हें इमरजेंसी में भर्ती दिखाया जाता था ताकि सरकार से अधिक पैसा वसूला जा सके। जांचकर्ताओं को मंथन हेल्थ केयर और धरम हॉस्पिटल के बीच 50:50 राजस्व साझाकरण के दस्तावेजी सबूत मिले हैं।

खुफिया जानकारी के आधार पर सीबीआई ने फरवरी 2026 में संयुक्त औचक निरीक्षण किया था, जिसके बाद गुरुवार को चंडीगढ़ और मोहाली के विभिन्न ठिकानों पर व्यापक छापेमारी की गई। इस दौरान मोबाइल फोन, बेहिसाब नकदी, संपत्ति के दस्तावेज और बड़ी मात्रा में फर्जी मेडिकल रिकॉर्ड जब्त किए गए हैं। व्हाट्सएप चैट से यह भी पता चला है कि मरीजों की भर्ती और डिस्चार्ज का समय पहले से ही तय कर लिया जाता था ताकि कागजी कार्रवाई को सेट किया जा सके। एजेंसी अब इस बात की जांच कर रही है कि इस घोटाले में कौन-कौन से सरकारी अधिकारी शामिल थे और सरकारी खजाने को कुल कितना नुकसान पहुँचाया गया है।