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जलवायु परिवर्तन के बड़े खतरे पर वैज्ञानिकों की चेतावनी, देखें वीडियो

नदियों में घट रही है ऑक्सीजन की मात्रा

  • मीठे पानी का स्वास्थ्य बिगड़ रहा है

  • वहां रहने वाली प्रजातियों भी खतरे में

  • इसे तुरंत सुधारने की बात कही गयी है

राष्ट्रीय खबर

रांचीः वैश्विक जलवायु परिवर्तन का एक और भयावह प्रभाव सामने आया है। हाल ही में प्रसिद्ध शोध पत्रिका साइंस एडवांसेज में प्रकाशित एक नए अध्ययन के अनुसार, जलवायु परिवर्तन दुनिया भर की नदियों से लगातार ऑक्सीजन को छीन रहा है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अधिकांश नदी प्रणालियों में दीर्घकालिक रूप से ऑक्सीजन की कमी (डीऑक्सीजनेशन) हो रही है, जिसमें उष्णकटिबंधीय (ट्रॉपिकल) क्षेत्रों की नदियां सबसे अधिक संवेदनशील और खतरे में पाई गई हैं। यह शोध मीठे पानी के पारिस्थितिकी तंत्र (फ्रेशवाटर इकोसिस्टम) को बचाने के लिए तत्काल ठोस रणनीतियां बनाने की आवश्यकता पर जोर देता है।

यह महत्वपूर्ण अध्ययन चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेज के नानजिंग इंस्टीट्यूट ऑफ ज्योग्राफी एंड लिम्नोलॉजी (एन आई जी एल ए एस) के प्रोफेसर कुन शी के नेतृत्व में किया गया है। इसमें डॉ. क्यूई गुआन ने मुख्य लेखक की भूमिका निभाई और टोंगजी विश्वविद्यालय के शोधकर्ता भी शामिल रहे।

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नदियों में घुली हुई ऑक्सीजन जलीय जीवों के अस्तित्व, जैव विविधता को बनाए रखने और महत्वपूर्ण जैव-भू-रासायनिक प्रक्रियाओं (बायोजियोकेमिकल प्रोसेस) के लिए रीढ़ की हड्डी का काम करती है। जब पानी में ऑक्सीजन का स्तर गिरता है, तो पूरी नदी का स्वास्थ्य बिगड़ जाता है, जिससे मछलियों और अन्य जलीय प्रजातियों का जीवन गंभीर संकट में आ जाता है।

समय के साथ नदियों में ऑक्सीजन के बदलते स्तर को समझने के लिए, शोधकर्ताओं ने मशीन-लर्निंग स्टैकिंग एल्गोरिदम का उपयोग किया। इसके तहत पिछले लगभग चार दशकों (1985-2023) के दौरान दुनिया भर की 21,439 नदियों से एकत्र किए गए डेटा का गहन विश्लेषण किया गया। इस विश्लेषण से एक स्पष्ट और चिंताजनक वैश्विक रुझान सामने आया।

इस शोध का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह रहा कि सबसे तीव्र ऑक्सीजन संकुचन  में भारत की नदियां भी शामिल हैं। अध्ययन ने साबित किया कि उष्णकटिबंधीय नदियों में पहले से ही ऑक्सीजन की सांद्रता कम होती है, जिससे तापमान में मामूली बढ़ोतरी भी उन्हें बेहद संवेदनशील बना देती है। वहीं, बांधों का प्रभाव उनके जलाशयों की गहराई पर निर्भर करता है। उथले (कम गहरे) जलाशयों में बांध बनने से ऑक्सीजन का नुकसान तेजी से हुआ, जबकि गहरे जलाशयों में इसने बांध वाले क्षेत्र में ऑक्सीजन की कमी को रोकने में मदद की।

कुल मिलाकर, ये निष्कर्ष बहते हुए मीठे पानी के पारिस्थितिकी तंत्र पर जलवायु परिवर्तन के बढ़ते घातक प्रभाव को उजागर करते हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि भविष्य के संकट को टालने के लिए उष्णकटिबंधीय नदियों को नीतिगत प्रयासों में सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। यह अध्ययन दुनिया भर के नीति निर्माताओं को नदियों के संरक्षण के लिए कानून और योजनाएं बनाने के लिए एक ठोस वैज्ञानिक आधार प्रदान करता है।

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