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जनता को अब सवाल पूछना सीख लेना चाहिए

लोकतंत्र की आधारशिला मतदान का अधिकार है। भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में, जहाँ चुनाव को एक महापर्व माना जाता है, वहाँ मतदाता सूची से लाखों नागरिकों के नाम अचानक गायब हो जाना केवल एक तकनीकी त्रुटि नहीं, बल्कि एक गहरा संवैधानिक संकट है। पश्चिम बंगाल में हाल ही में सामने आए वोटर डिलीशन के मामलों ने देश की सर्वोच्च अदालत से लेकर चुनाव आयोग तक की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है।

भारत का संविधान अनुच्छेद 326 के तहत प्रत्येक वयस्क नागरिक को मताधिकार प्रदान करता है। सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर अपने विभिन्न निर्णयों में स्पष्ट किया है कि भारत की धरती पर जन्म लेने वाले व्यक्ति के पास न केवल नागरिकता का, बल्कि अपने प्रतिनिधि चुनने का जन्मसिद्ध और संवैधानिक अधिकार है। यह अधिकार किसी भी व्यक्ति की पहचान और राष्ट्र के निर्माण में उसकी भागीदारी का प्रतीक है।

हालांकि, पश्चिम बंगाल में स्थिति इसके विपरीत दिख रही है। रिपोर्टों के अनुसार, लाखों मतदाताओं के नाम सूची से काट दिए गए हैं। इनमें से कई वे लोग हैं जो पीढ़ियों से इसी मिट्टी में रह रहे हैं और जिनके पास वैध दस्तावेज मौजूद हैं। इन लोगों के लिए अब अपने अस्तित्व को साबित करना एक लंबी कानूनी लड़ाई बन गया है। जब लाखों लोगों का भविष्य अधर में हो, तो स्वाभाविक रूप से जनता की नजरें न्यायपालिका की ओर उठती हैं।

विडंबना यह है कि जहाँ एक ओर सुप्रीम कोर्ट व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अधिकारों की दुहाई देता है, वहीं मतदाता सूची के इस व्यापक हेरफेर के मामले में उसकी हस्तक्षेप न करने की नीति ने सबको चौंका दिया है। अदालत का तर्क अक्सर यह रहता है कि चुनावी प्रक्रियाओं में सुधार के लिए न्यायाधिकरण या चुनाव आयोग के पास जाना चाहिए।

लेकिन सवाल यह है कि जब मामला सीधे तौर पर राइट टू वोट के हनन का हो, तो क्या शीर्ष अदालत का मौन रहना उचित है? लाखों लोग जो गरीबी और अशिक्षा से जूझ रहे हैं, उनके लिए न्यायाधिकरणों के चक्कर काटना और वकीलों की फीस भरना लगभग नामुमकिन है। यह स्थिति न्याय की सुलभता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती है। भारत का चुनाव आयोग एक स्वायत्त संवैधानिक संस्था है, जिसका कार्य निष्पक्ष चुनाव संपन्न कराना है।

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में, विपक्ष और नागरिक समाज के एक बड़े वर्ग ने आरोप लगाया है कि आयोग की निष्पक्षता खत्म होती जा रही है। पश्चिम बंगाल के संदर्भ में यह आरोप और भी गंभीर हो जाते हैं। आलोचकों का तर्क है कि चुनाव आयोग अब एक स्वतंत्र संस्था के बजाय सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के एजेंट के रूप में काम कर रहा है।

मतदाता सूची से चुनिंदा समुदायों या क्षेत्रों के नाम हटाने की प्रक्रिया को राजनीतिक विद्वेष से प्रेरित बताया जा रहा है। जब डेटा में इस तरह का असंतुलन दिखता है, जहाँ विपक्षी गढ़ वाले क्षेत्रों में बड़ी संख्या में नाम काट दिए जाते हैं, तो आयोग की साख पर उंगली उठना लाजमी है। एक निष्पक्ष आयोग का कर्तव्य था कि वह इन नामों को काटने से पहले एक पारदर्शी जांच प्रक्रिया अपनाता और प्रभावित लोगों को अपनी बात रखने का पूरा अवसर देता। यदि मतदाता सूची को ही हथियार बनाकर चुनाव जीतने की रणनीति अपनाई जाने लगे, तो चुनाव महज एक औपचारिकता बनकर रह जाएंगे।

लोकतंत्र के महापर्व में धांधली की शुरुआत मतदान केंद्र से नहीं, बल्कि मतदाता सूची तैयार करने वाले दफ्तरों से शुरू हो रही है। यह न केवल मतदाताओं का अपमान है, बल्कि संविधान निर्माताओं के सपनों के साथ धोखा भी है। पश्चिम बंगाल की यह समस्या केवल एक राज्य तक सीमित नहीं है; यह भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की सड़न को दर्शाती है।

यदि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में हस्तक्षेप कर नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा नहीं करता है, और यदि चुनाव आयोग अपनी खोई हुई निष्पक्षता वापस नहीं पाता है, तो आम आदमी का लोकतांत्रिक संस्थाओं से भरोसा पूरी तरह उठ जाएगा। लोकतंत्र को बचाने के लिए जरूरी है कि मतदाता सूची पारदर्शी हो और हर उस व्यक्ति का नाम उसमें शामिल हो जो इस देश का नागरिक है, चाहे उसकी राजनीतिक विचारधारा या धर्म कुछ भी हो।

अब इससे आगे निकलते हुए यह आम जनता के विचार और निर्णय का विषय है कि जितनी संस्थाओं की ऊपर चर्चा हुई है। सभी में कार्यरत लोगों का वेतन दरअसल जनता के पैसे से ही चलता है। मौखिक तौर पर लोग इसे स्वीकारते हैं पर दरअसल जनता के प्रति वेतन पाने वाले सरकारी कर्मचारी अपनी इस जिम्मेदारी का व्यवहार में पालन नहीं करते हैं। अगर जनता ने सही अर्थों में सवाल करना प्रारंभ कर दिया तो हालात बदलने में समय कम लगेगा।