खत्म हुआ नीतीश कुमार का काफी पुराना राज
-
नीतीश के इस्तीफे के बाद हुआ फैसला
-
भाजपा विधायक दल का नेता चुना गया
-
जदयू के सीएम की मांग अनसुनी हो गयी
राष्ट्रीय खबर
पटनाः पटना में आयोजित एनडीए की बैठक के दौरान सम्राट चौधरी को बिहार में भाजपा विधायक दल का नेता चुन लिया गया है। इस निर्णय ने उनके राज्य के अगले मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। इससे पूर्व, मंगलवार को नीतीश कुमार ने पटना में अपनी कैबिनेट की अंतिम बैठक के बाद उसे भंग करते हुए मुख्यमंत्री पद से अपना इस्तीफा सौंप दिया। विधायक दल के नेता के रूप में सम्राट चौधरी के नाम का प्रस्ताव विजय कुमार सिन्हा द्वारा रखा गया, जिसका समर्थन रेणु देवी, मंगल पांडे और दिलीप जायसवाल ने किया। इसकी औपचारिक घोषणा शिवराज सिंह चौहान ने की, जो केंद्रीय पर्यवेक्षक के रूप में एनडीए की इस महत्वपूर्ण बैठक में शामिल हुए थे।
इससे पहले जदयू प्रमुख नीतीश कुमार ने इस अवसर पर कहा कि केंद्र सरकार बिहार के विकास में पूर्ण सहयोग प्रदान कर रही है। उन्होंने इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आभार व्यक्त करते हुए कहा, बिहार अब और भी तेजी से विकास करेगा और देश के अग्रणी राज्यों की श्रेणी में शामिल होगा। उन्होंने विश्वास जताया कि राज्य राष्ट्र की प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान देगा।
सम्राट चौधरी का राजनीतिक उत्कर्ष किसी फ़िल्मी पटकथा से कम नहीं है। हालाँकि उनकी वैचारिक जड़ें न तो संघ से जुड़ी थीं और न ही उन्होंने भाजपा से अपना राजनीतिक सफर शुरू किया, लेकिन आज वे बिहार भाजपा के सबसे कद्दावर चेहरे के रूप में स्थापित हो चुके हैं। पिछले आठ वर्षों में उन्होंने जिस गति से राजनीतिक सीढ़ियां चढ़ी हैं, उसने कई दिग्गजों को पीछे छोड़ दिया है।
सम्राट को राजनीति विरासत में मिली। उनके पिता शकुनी चौधरी प्रदेश की राजनीति के एक बड़े नाम रहे हैं, जिन्होंने कांग्रेस, समता पार्टी और राजद के साथ लंबी पारी खेली। अपने पिता के राजनीतिक प्रभाव की बदौलत सम्राट ने 90 के दशक में राजद के साथ मैदान में कदम रखा। मात्र 19 साल की उम्र में वे राबड़ी देवी सरकार में मंत्री बनकर चर्चा में आए, हालाँकि कम उम्र के कारण उपजे कानूनी विवाद के चलते उन्हें पद छोड़ना पड़ा था।
राजद के बाद सम्राट चौधरी ने जदयू का दामन थामा। जीतनराम मांझी की सरकार में उन्होंने कैबिनेट मंत्री के रूप में कार्य किया, लेकिन नीतीश कुमार की वापसी के बाद उन्हें वह अहमियत नहीं मिली जिसकी वे अपेक्षा कर रहे थे। इसी उपेक्षा ने उन्हें विकल्प तलाशने पर मजबूर किया और अंततः उन्होंने जदयू को अलविदा कह दिया।
2018 में भाजपा में शामिल होना सम्राट के करियर का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। भाजपा की कार्यशैली उन्हें ऐसी रास आई कि वे कम समय में ही नंबर वन की स्थिति में पहुँच गए। बिहार के कोइरी (कुशवाहा) समाज पर उनकी मजबूत पकड़ को देखते हुए भाजपा ने उन्हें लगातार बड़ी जिम्मेदारियां सौंपी हैं। 2025 के चुनावों में विपक्ष के कड़े हमलों के बावजूद एनडीए की वापसी और उनका दोबारा उपमुख्यमंत्री बनना यह संकेत देता है कि अब वे मुख्यमंत्री की कुर्सी के बेहद करीब हैं। अपनी रणनीतिक सूझबूझ और पिता की सियासी विरासत को नई ऊंचाइयों पर ले जाकर सम्राट अब सही मायनों में बिहार के चौधरी बनकर उभरे हैं।