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जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की निष्पक्षता पर संदेह

अदालत में केजरीवाल ने जो नहीं कही, वे भी सार्वजनिक

  • तर्कपूर्ण तरीके से अपनी बातें रख दी

  • पहली बार अदालत को सुनना पड़ा इसे

  • एकतरफा फैसले के उदाहरण पेश किये

राष्ट्रीय खबर

नई दिल्ली: दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कथित शराब नीति घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय की कार्यप्रणाली और विशेष रूप से जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उच्च न्यायालय में अपनी दलीलें पूरी करते हुए केजरीवाल ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उन्हें इस अदालत से न्याय मिलने की उम्मीद क्षीण होती जा रही है। उन्होंने जस्टिस शर्मा से इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग करने का अनुरोध करते हुए सात प्रमुख बिंदुओं के माध्यम से अपने आरोपों को विस्तार दिया।

केजरीवाल ने अपनी पहली दलील में जस्टिस शर्मा के ‘अधिवक्ता परिषद’ के कार्यक्रमों में शामिल होने पर आपत्ति जताई। उन्होंने तर्क दिया कि यह संगठन एक विशिष्ट राजनीतिक विचारधारा से प्रेरित है, जिसका आम आदमी पार्टी मुखर विरोध करती है। केजरीवाल के अनुसार, जब न्यायाधीश की वैचारिक पृष्ठभूमि उनके (केजरीवाल के) राजनीतिक स्टैंड के विपरीत हो, तो न्याय की निष्पक्षता पर संदेह होना स्वाभाविक है। हालांकि, जस्टिस शर्मा ने प्रतिवाद करते हुए पूछा कि क्या उन कार्यक्रमों में कोई भी बात कानूनी विमर्श से हटकर विचारधारात्मक थी।

केजरीवाल ने गृह मंत्री के एक हालिया टीवी साक्षात्कार का संदर्भ देते हुए सनसनीखेज आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि फैसला आने से पहले ही गृह मंत्री को यह कैसे पता था कि केजरीवाल को राहत नहीं मिलेगी और उन्हें सुप्रीम कोर्ट जाना होगा? उन्होंने आशंका जताई कि क्या जांच एजेंसियों, सरकार और इस विशेष पीठ के बीच फैसलों को लेकर पहले से ही कोई समझ बनी हुई है।

मुख्यमंत्री ने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि पिछले पांच में से चार मामलों में इस अदालत ने प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआई की हर मांग को ज्यों का त्यों स्वीकार कर लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि सीबीआई उन्हें जल्द से जल्द अपराधी सिद्ध करने के अभियान में है और यह अदालत बिना किसी ठोस परीक्षण के एजेंसी का समर्थन कर रही है। केजरीवाल ने याद दिलाया कि इसी अदालत ने उन्हें पहले ‘भ्रष्ट’ कहा था, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने न केवल रद्द किया बल्कि कड़ी टिप्पणी भी की। उन्होंने दावा किया कि इस पीठ के तीन आदेशों को शीर्ष अदालत पहले ही पलट चुकी है, जो इसकी एकतरफा कार्यप्रणाली का प्रमाण है।

केजरीवाल ने यह भी आरोप लगाया कि बिना चार्जशीट दाखिल हुए ही अदालत ने उन्हें दोषी की तरह चित्रित करने वाली टिप्पणियां कीं। उन्होंने दुख व्यक्त किया कि उनकी गिरफ्तारी की वैधता पर विचार करते समय उन्हें अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर नहीं मिला और सरकारी गवाह के बयानों पर मात्र पांच मिनट की सुनवाई में भरोसा कर लिया गया।

अंत में, उन्होंने सोशल मीडिया के ट्रेंड्स और निचली अदालत की टिप्पणियों पर हाई कोर्ट द्वारा रोक लगाए जाने का मुद्दा उठाते हुए कहा कि इन सब घटनाओं ने उनके मन में पक्षपात के डर को पुख्ता कर दिया है। जस्टिस शर्मा ने इन आरोपों पर संयम बरतते हुए कहा कि उनके द्वारा दिए गए आदेश एक सीमित कानूनी दायरे में थे और मामले की विस्तृत जांच ट्रायल कोर्ट में होना अभी शेष है।