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इलेक्ट्रिक वाहन का प्रदूषण चालान का मजाक

राजस्थान का नया वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हुआ

राष्ट्रीय खबर

जयपुरः सोशल मीडिया पर इन दिनों राजस्थान के नागौर का एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसने नेटिजन्स का ध्यान अपनी ओर खींचा है। मामला एक पुलिस अधिकारी द्वारा एक इलेक्ट्रिक वाहन के मालिक से प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र मांगने से जुड़ा है। टाटा टियागो ईवी  के मालिक और एक सहायक उप-निरीक्षक के बीच हुई इस बहस के वीडियो ने इंटरनेट पर हंसी-मजाक और प्रतिक्रियाओं की बाढ़ ला दी है।

वीडियो में देखा जा सकता है कि एक व्यक्ति पुलिस अधिकारी से इस बात पर बहस कर रहा है कि उसकी कार की खिड़कियों पर काले शीशे होने के कारण उस पर जुर्माना लगाया गया है। ड्राइवर का दावा था कि वे केवल सनशेड (धूप से बचाव के पर्दे) थे और कानून उनके उपयोग पर रोक नहीं लगाता है। बहस के दौरान विवाद तब और बढ़ गया जब अधिकारी ने वाहन के लिए प्रदूषण प्रमाणपत्र की मांग कर दी, जिस पर ड्राइवर ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इलेक्ट्रिक वाहन को प्रदूषण प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं होती है।

जब मामला सोशल मीडिया पर चर्चा में आ गया तो पुलिस अधिकारियों ने स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि मुख्य विवाद कार की खिड़कियों से शेड्स हटाने को लेकर था। इस गहमागहमी और भ्रम की स्थिति में, गलती से सिस्टम में प्रदूषण से संबंधित चालान जारी हो गया। अधिकारियों ने अब यह स्वीकार किया है कि यह एक मानवीय त्रुटि थी। पुलिस प्रशासन ने आश्वासन दिया है कि मामले की समीक्षा की जा रही है और इस गलत चालान को सिस्टम से वापस ले लिया जाएगा।

कानूनी रूप से देखा जाए तो केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989 के तहत, इलेक्ट्रिक वाहनों को बैटरी से चलने वाले वाहनों की श्रेणी में रखा गया है। चूंकि इन वाहनों में टेलपाइप (साइलेंसर) नहीं होता और ये किसी भी प्रकार का धुआं या उत्सर्जन नहीं करते, इसलिए इन्हें नियमित पीयूसी परीक्षण की आवश्यकता नहीं होती है।

सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के दिशा-निर्देश भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि बैटरी चालित वाहनों को बिना किसी आवधिक प्रदूषण जांच के चलाया जा सकता है। PUC प्रमाणन मुख्य रूप से पेट्रोल, डीजल और अन्य जीवाश्म ईंधन से चलने वाले वाहनों के लिए अनिवार्य है ताकि वाहनों से होने वाले वायु प्रदूषण को नियंत्रित किया जा सके। यह घटना न केवल पुलिस कर्मियों के लिए डिजिटल चालान प्रणाली के प्रशिक्षण की आवश्यकता को दर्शाती है, बल्कि नागरिकों को उनके कानूनी अधिकारों के प्रति जागरूक रहने की प्रेरणा भी देती है।