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महाभियोग के प्रस्ताव के खारिज होने के बाद राजनीति जारी

इंडिया गठबंधन का आरोप संसद की अवहेलना की

  • संसदीय प्रथा का सीधा उल्लंघन हुआ है

  • सामूहिक सोच का फैसला अस्वीकृत

  • ऐसे में तो कोई महाभियोग नहीं चलेगा

राष्ट्रीय खबर

नई दिल्ली: विपक्षी इंडिया गठबंधन के नेताओं ने बुधवार को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और राज्यसभा के सभापति सी.पी. राधाकृष्णन के उस निर्णय की कड़ी आलोचना की, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए 193 विपक्षी सांसदों द्वारा दिए गए नोटिस को खारिज कर दिया गया था। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि इस फैसले के जरिए सामूहिक संसदीय विवेक को दरकिनार कर दिया गया है।

विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि पीठासीन अधिकारियों ने यह निर्णय लेने से पहले स्वयं ही एक मिनी-ट्रायल (छोटा परीक्षण) कर लिया, बिना यह बताए कि उन्होंने इस नतीजे पर पहुंचने से पहले किन लोगों या विशेषज्ञों से परामर्श किया था। राज्यसभा सांसद और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने तर्क दिया कि पीठासीन अधिकारियों का काम केवल यह देखना था कि प्रथम दृष्टया नोटिस सही है या नहीं।

उन्होंने कहा, इसका सीधा अर्थ यह है कि उन्हें केवल यह स्थापित करना था कि नोटिस नियमानुसार है या नहीं। सिंघवी, जो सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता भी हैं, के साथ तृणमूल कांग्रेस के डेरेक ओ’ब्रायन और सागरिका घोष, राजद के मनोज झा और आप के संदीप पाठक सहित कई अन्य विपक्षी नेता मौजूद थे।

सिंघवी ने प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए कहा कि एक बार ऐसा नोटिस जमा होने के बाद, इसे लगाए गए आरोपों की जांच के लिए एक जांच समिति के पास भेजा जाना चाहिए। इसके बाद वह समिति संसद को अपनी रिपोर्ट सौंपती है, जिस पर अंतिम निर्णय संसद द्वारा लिया जाता है।

उन्होंने चेतावनी दी कि यदि विपक्ष के नोटिस को पीठासीन अधिकारी की मेज से आगे बढ़ने की अनुमति नहीं दी जाती है, तो देश में कभी महाभियोग नहीं हो पाएगा और किसी को भी जवाबदेह नहीं ठहराया जा सकेगा। सिंघवी ने कहा, प्रथम दृष्टया विचार करने के बजाय सभापति ने स्वयं ही मुकदमा चला दिया। यह पूरी तरह से गलत है।

विपक्षी नेताओं ने उस आदेश की भी आलोचना की, जिसमें मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन से संबंधित सर्वोच्च न्यायालय में लंबित मामलों का हवाला देते हुए ज्ञानेश कुमार के खिलाफ संसदीय जांच शुरू न करने की बात कही गई है। सिंघवी ने कहा, महाभियोग एक स्वतंत्र और स्वायत्त संवैधानिक प्रक्रिया है।

मामले के न्यायाधीन होने का तर्क देकर इसकी संप्रभुता और अखंडता को दबाने की कोशिश की जा रही है। दूसरी ओर, दोनों पीठासीन अधिकारियों द्वारा जारी 17 पन्नों के विस्तृत आदेश में कहा गया है कि विपक्ष द्वारा लगाए गए आरोपों में या तो सबूतों की कमी थी, या वे मामले पहले ही तय हो चुके थे, अथवा वर्तमान में न्यायिक जांच के दायरे में हैं।