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इस अति महामानव का दुनिया क्या करें

हाल के दिनों में संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्र के नाम दिए गए संबोधन ने न केवल अमेरिकी नागरिकों, बल्कि पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। इस संबोधन में राष्ट्रपति ने ईरान के विरुद्ध धमकियों और पुराने तर्कों का एक ऐसा मिश्रण प्रस्तुत किया, जिसने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में हलचल मचा दी है।

राष्ट्रपति का यह दावा कि अमेरिका ईरान को पाषाण युग में वापस भेज देगा और इस युद्ध को मात्र दो से तीन सप्ताह के भीतर समाप्त कर अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर लेगा, न केवल सैन्य अहंकार को दर्शाता है, बल्कि आधुनिक युद्ध की जटिलताओं की अनदेखी भी करता है। अमेरिकी प्रशासन की सबसे बड़ी समस्या उसकी नीतियों में निरंतर होने वाला भटकाव और विरोधाभासी दावे रहे हैं।

एक ओर राष्ट्रपति हाल के दिनों में ईरान के साथ मध्यस्थता के प्रयासों की बात करते रहे हैं, लेकिन अपने ताज़ा संबोधन में उन्होंने इस पर लगभग चुप्पी साधे रखी। यह अस्थिरता अंतरराष्ट्रीय हितधारकों, क्षेत्रीय शक्तियों और वैश्विक समुदाय के लिए वाशिंगटन पर भरोसा करना कठिन बना देती है।

जब किसी महाशक्ति का नेतृत्व लगातार अपने रुख को बदलता है, तो कूटनीतिक वार्ताओं की गुंजाइश खत्म होने लगती है। एक तरफ युद्धविराम और शीघ्र युद्ध खत्म होने की बात हो रही है तो दूसरी तरफ ईरान के सबसे बड़े पुल को उड़ा देने की दावेदारी हो रही है। विडंबना यह है कि एक ओर अमेरिकी प्रशासन यह दावा करता है कि वह ईरान की जनता को उनके वर्तमान शासकों से मुक्त कराना चाहता है, वहीं दूसरी ओर वह उसी राष्ट्र पर कार्पेट बमबारी करने की धमकी देता है।

वास्तविकता यह है कि अमेरिका के प्रतिबंधों की मार सीधे तौर पर ईरान की फार्मास्युटिकल (दवा) कंपनियों और जल सुविधाओं जैसे नागरिक बुनियादी ढांचों पर पड़ रही है। यह विरोधाभास दर्शाता है कि अमेरिका की नीतियां मानवीय आधार पर नहीं, बल्कि केवल दबाव की राजनीति पर टिकी हैं।

ईरान ने भी अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। उसका मानना है कि किसी भी युद्धविराम का तब तक कोई अर्थ नहीं है, जब तक उसमें भविष्य में हमला न होने की ठोस गारंटी शामिल न हो। राष्ट्रपति के बड़े-बड़े दावों के विपरीत, ज़मीनी हकीकत यह है कि होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण ईरान का है, जो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की जीवन रेखा है।

यदि यह मार्ग बाधित होता है, तो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था चरमरा सकती है। इसके अलावा, ईरान की नौसेना और मिसाइल कार्यक्रम अभी भी अक्षम नहीं हुए हैं, और वहां का नेतृत्व वैचारिक रूप से एकजुट है। अमेरिका को यह समझना होगा कि ईरान कोई वेनेजुएला नहीं है, जिसे केवल प्रतिबंधों और धमकियों से झुकाया जा सके।

ईरान की सैन्य क्षमता और उसकी भौगोलिक स्थिति उसे एक कठिन प्रतिद्वंद्वी बनाती है। मध्य पूर्व में अमेरिकी सैनिकों की बढ़ती तैनाती और ईरानी द्वीपों या मुख्य भूमि पर जमीनी कार्रवाई की सुगबुगाहट ने तनाव को चरम पर पहुँचा दिया है। यदि अमेरिका जमीनी हमले जैसा कदम उठाता है, तो ईरान की प्रतिक्रिया केवल रक्षात्मक नहीं होगी।

वह न केवल अमेरिकी सैनिकों को निशाना बनाएगा, बल्कि खाड़ी क्षेत्र में व्यापक आक्रामकता के साथ जवाब देगा। अमेरिकी रणनीतिकारों की यह सोच हमेशा से अपरिपक्व रही है कि वे युद्ध की समयसीमा या उसकी तीव्रता को अपनी इच्छा अनुसार नियंत्रित कर सकते हैं। युद्ध शुरू करना आसान हो सकता है, लेकिन उसे खत्म करना और उसके परिणामों को संभालना अक्सर किसी भी महाशक्ति के नियंत्रण से बाहर हो जाता है।

वियतनाम और अफगानिस्तान के अनुभव इस बात के गवाह हैं, फिर भी वाशिंगटन अपनी गलतियों से सीखता हुआ नहीं दिख रहा है। जब दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति का प्रमुख विरोधाभासी और उग्र दावे करता है, तो वैश्विक राजनीति में एक गंभीरता का शून्य पैदा हो जाता है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय अब वाशिंगटन के बयानों को संदेह की दृष्टि से देखने लगा है। शांति और स्थिरता के लिए आवश्यक है कि अमेरिका अपनी धमकियों के बजाय एक सुसंगत और पारदर्शी विदेश नीति अपनाए।

अंततः, ईरान-अमेरिका संघर्ष केवल दो देशों का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह वैश्विक शांति के लिए एक गंभीर चुनौती है। मध्यस्थता के प्रयासों को नजरअंदाज करना और युद्धोन्माद को बढ़ावा देना किसी भी पक्ष के हित में नहीं है। क्या वाशिंगटन ने इतिहास से कोई सबक सीखा है? यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर आने वाला समय ही देगा, लेकिन वर्तमान संकेत किसी बड़े संकट की ओर इशारा कर रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि डोनाल्ड ट्रंप सुबह कुछ कहते हैं और शाम को अपनी सुबह वाली बात के ठीक विपरित कुछ कहने लगते हैं। इस आरोप में दम नजर आता है कि वह भी एपस्टीन फाइलों की जांच से चिंतित है। ऐसे व्यक्ति से दुनिया आखिर क्या उम्मीद करे।