कच्छ के घास के मैदानों से पर्यावरण के लिए अच्छी खबर
राष्ट्रीय खबर
अहमदाबादः गुजरात के कच्छ जिले में एक दशक के लंबे इंतजार के बाद गोडावण पक्षी के एक चूजे ने जन्म लिया है। यह घटना न केवल गुजरात के लिए, बल्कि पूरी दुनिया के वन्यजीव संरक्षण इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुई है। इस सफलता के पीछे वैज्ञानिकों की कड़ी मेहनत और 770 किलोमीटर का एक जोखिम भरा सफर शामिल है। कच्छ में केवल तीन मादा जीआईबी बची थीं और नर पक्षी न होने के कारण वहां प्राकृतिक रूप से प्रजनन की कोई संभावना नहीं थी। अगस्त 2025 में टैग की गई एक मादा जीआईबी ने कच्छ में एक निष्क्रिय अंडा दिया था। वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के वैज्ञानिकों ने राजस्थान के सैम स्थित ब्रीडिंग सेंटर से एक ऊर्वर अंडे को कच्छ पहुँचाने की योजना बनाई।
एक पोर्टेबल इनक्यूबेटर में रखे इस अंडे को सड़क मार्ग से 19 घंटे तक लगातार चलाकर 770 किलोमीटर दूर नलिया (गुजरात) लाया गया। 22 मार्च को वैज्ञानिकों ने बेहद सावधानी से मादा के घोंसले में रखे बांझ अंडे को हटाकर राजस्थान से लाए गए उर्वर अंडे से बदल दिया। मादा पक्षी ने इस पोषक मां की भूमिका बखूबी निभाई और अंडे को सेना जारी रखा।
अंततः 26 मार्च को अंडे से चूजा बाहर आ गया। फील्ड मॉनिटरिंग टीम ने पुष्टि की है कि मादा पक्षी अपने प्राकृतिक आवास में चूजे का पालन-पोषण कर रही है। भारत में अब 150 से भी कम गोडावण बचे हैं, जिनमें से अधिकांश राजस्थान में हैं। सैम और रामदेवरा स्थित ब्रीडिंग सेंटर्स में पक्षियों की संख्या अब 73 तक पहुँच गई है। इस सीजन में 5 नए चूजे पैदा हुए हैं।
दुनिया भर की 26 बस्टर्ड प्रजातियों में से 15 खतरे में हैं। भारत में मौजूद तीनों प्रजातियां—जीआईबी, लेसर फ्लोरिकन और बंगाल फ्लोरिकन—अत्यंत लुप्तप्राय श्रेणी में हैं। ऐतिहासिक रूप से शिकार और बिजली के बुनियादी ढांचे के कारण इन पक्षियों की संख्या घटी है। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल दिसंबर में राजस्थान के 14,013 वर्ग किमी और गुजरात के 740 वर्ग किमी क्षेत्र को संरक्षण के लिए प्राथमिकता देने का आदेश दिया था। सरकार अब आने वाले समय में इन पक्षियों को वापस जंगलों में छोड़ने की योजना पर काम कर रही है।