Breaking News in Hindi
ब्रेकिंग
Lohardaga Fire News: कुडू में फर्नीचर शोरूम में लगी भीषण आग; 15 लाख का सामान जलकर खाक Jharkhand Health Department: रिम्स में मेडिकल एडमिशन में अनियमितता; स्वास्थ्य मंत्री के निर्देश पर C... Car Fire Incident NH-33: हजारीबाग से रांची जा रही कार में अचानक लगी आग; परिवार के चार सदस्य सुरक्षित Jharkhand Health News: अवैध नर्सिंग होम और अल्ट्रासाउंड सेंटर्स पर स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी का ... Garhwa Monsoon Update: गढ़वा में अब तक 'जीरो' बारिश; खेती के लक्ष्य को लेकर कृषि विभाग चिंता में Jharkhand Politics: राज्यसभा चुनाव के बाद बढ़ा राजनीतिक पारा; भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आमने-सामने भाजप... Jharkhand News: मुहर्रम जुलूस को लेकर प्रशासन सख्त; डीजे पर प्रतिबंध, ड्रोन से निगरानी और CRPF की तै... Jharkhand Jobs News: स्वास्थ्य विभाग में बड़ी नियुक्तियां; 56 फूड सेफ्टी ऑफिसर और 151 विशेषज्ञ डॉक्टर... Sports Promotion Ranchi: रांची रेल मंडल शुरू करेगा चेस, फुटबॉल और वॉलीबॉल अकादमी; नि:शुल्क प्रशिक्षण... Jamtara School Raid: स्कूल के बरामदे में बैठकर ग्राहकों को लूट रहे थे साइबर अपराधी, पुलिस ने रंगे हा...

मालेगांव विस्फोट मामला में केस बंद

बीस वर्ष पुराने मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने कार्रवाई की

  • वर्ष 2006 में दर्ज हुआ था यह मामला

  • कई एजेंसियों ने इसकी जांच की थी

  • कोई ठोस सबूत या गवाह नहीं था

राष्ट्रीय खबर

मुंबईः बॉम्बे हाई कोर्ट ने बुधवार को एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए 2006 के मालेगांव बम विस्फोट मामले में चार आरोपियों के खिलाफ आरोप तय करने के आदेश को रद्द कर दिया। मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रशेखर और न्यायमूर्ति श्याम चांडक की खंडपीठ ने आरोपियों द्वारा दायर उन अपीलों पर यह फैसला सुनाया, जिसमें एक विशेष अदालत के सितंबर 2025 के आदेश को चुनौती दी गई थी। इस फैसले के साथ ही राजेंद्र चौधरी, धन सिंह, मनोहर राम सिंह नरवरिया और लोकेश शर्मा के विरुद्ध चल रहा मुकदमा समाप्त हो गया है और उन्हें मामले से मुक्त (डिस्चार्ज) कर दिया गया है।

अदालत ने अपनी कार्यवाही के दौरान न केवल आरोप तय करने के तरीके पर सवाल उठाए, बल्कि राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण द्वारा पेश किए गए साक्ष्यों की गुणवत्ता पर भी गौर किया। इससे पहले जनवरी 2026 के एक आदेश में, हाई कोर्ट ने माना था कि इस मामले में हस्तक्षेप की प्रथम दृष्टया गुंजाइश है और अपील के लंबित रहने तक ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही पर रोक लगा दी थी। साथ ही, अदालत ने अपील दायर करने में हुई 49 दिनों की देरी को भी यह कहते हुए माफ कर दिया था कि यह एनआईए अधिनियम की धारा 21 के तहत एक वैधानिक अपील है।

यह मामला 8 सितंबर 2006 का है, जब महाराष्ट्र के पावरलूम शहर मालेगांव में हुए सिलसिलेवार विस्फोटों के बाद अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम और भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था। इस मामले की जांच के कई चरण रहे—सबसे पहले महाराष्ट्र आतंकवाद विरोधी दस्ते ने जांच की और 12 लोगों को गिरफ्तार किया। बाद में फरवरी 2007 में जांच सीबीआई को सौंपी गई और अंततः एनआईए ने इसे अपने हाथ में लिया। एनआईए ने ही अपनी पूरक जांच के बाद इन चार वर्तमान याचिकाकर्ताओं को आरोपी बनाया था।

अदालत में अपीलकर्ताओं के वकील ने दो मुख्य तर्क दिए: पहला यह कि एनआईए ऐसा कोई चश्मदीद गवाह पेश करने में विफल रही जिसने वास्तव में घटना को होते देखा हो; और दूसरा यह कि मामले के अन्य आरोपियों को जिस तरह से पहले आरोपमुक्त किया गया था, वह अवैध था।

उच्च न्यायालय ने इन दलीलों को स्वीकार करते हुए चारों आरोपियों को डिस्चार्ज करने का आदेश दिया। मालेगांव 2006 विस्फोट मामला भारतीय न्यायिक इतिहास के सबसे जटिल मामलों में से एक रहा है। तीन अलग-अलग जांच एजेंसियों के हाथों से गुजरने के कारण इस मामले में साक्ष्यों और आरोपियों की पहचान को लेकर कई बार विरोधाभासी स्थितियां उत्पन्न हुईं। बॉम्बे हाई कोर्ट का आज का फैसला इस बात की पुष्टि करता है कि बिना ठोस प्रत्यक्ष साक्ष्य या चश्मदीद गवाहों के, केवल संदेह के आधार पर किसी व्यक्ति के विरुद्ध मुकदमा जारी नहीं रखा जा सकता।

यह निर्णय उन आरोपियों के लिए बड़ी कानूनी जीत है जो पिछले कई वर्षों से इस कानूनी प्रक्रिया का सामना कर रहे थे। हालांकि, यह फैसला जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर भी सवालिया निशान खड़े करता है, विशेषकर आतंकी मामलों में जहां साक्ष्यों का संकलन अत्यंत संवेदनशील होता है। इस डिस्चार्ज के बाद अब उन अपीलों पर भी ध्यान केंद्रित होगा जो अन्य सह-आरोपियों को मुक्त किए जाने के खिलाफ अभी भी लंबित हैं। लगभग 20 वर्षों बाद भी यह मामला न्याय और सुरक्षा के संतुलन के बीच एक महत्वपूर्ण उदाहरण बना हुआ है।