सुप्रीम कोर्ट ने कहा भेदभाव की अस्पष्ट आशंका
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तीन जजों की पीठ ने सुनाया फैसला
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इसमें हर किसी को आजादी मिली है
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दंड की आशंका केवल कल्पना है
राष्ट्रीय खबर
नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम गाने से संबंधित गृह मंत्रालय के एक सर्कुलर के खिलाफ दायर याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह निर्देश अनिवार्य नहीं था। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पांचोली की पीठ ने मोहम्मद सईद नूरी द्वारा दायर याचिका को असामयिक और भेदभाव की अस्पष्ट आशंका पर आधारित करार दिया।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने तर्क दिया कि वे देश के हर धर्म का सम्मान करते हैं, लेकिन यदि लोगों को उनके धर्म और विश्वास की परवाह किए बिना गीत गाने के लिए मजबूर किया जाता है, तो कुछ लोग इसे निष्ठा के सामाजिक प्रदर्शन में शामिल होने की मजबूरी मान सकते हैं। इस पर न्यायमूर्ति बागची ने पूछा कि क्या सर्कुलर में गीत न गाने पर किसी दंडात्मक कार्रवाई का उल्लेख है या क्या किसी व्यक्ति को इसके लिए सभा से निकाला गया है।
हेगड़े ने कहा कि व्यवधान की स्थिति में दंड का प्रावधान है और भले ही कोई कानूनी मंजूरी न हो, लेकिन गीत गाने या खड़े होने से इनकार करने वाले व्यक्ति पर हमेशा एक भारी मानसिक दबाव रहता है। उन्होंने सवाल किया कि क्या एक एडवाइजरी की आड़ में लोगों को गीत गाने के लिए मजबूर किया जा सकता है? मुख्य न्यायाधीश कांत ने पूछा कि क्या याचिकाकर्ता को ऐसा कोई नोटिस मिला है जो किसी को गीत गाने के लिए मजबूर करता हो।
न्यायमूर्ति बागची ने टिप्पणी की, केंद्र सरकार के निर्देश की धारा 5 में सकते हैं शब्द का प्रयोग किया गया है। यह स्वतंत्रता राष्ट्रीय गीत गाने के लिए उतनी ही है जितनी न गाने के लिए। इसीलिए यह कानूनी अधिकारों का उल्लंघन नहीं करता। पीठ ने याचिकाकर्ता से कहा कि यदि भविष्य में उनके खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई या नोटिस जारी होता है, तो वे अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं। वर्तमान में यह याचिका केवल भेदभाव की एक काल्पनिक आशंका मात्र है।