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असम बीजेपी को लगा और एक झटका मंत्री ने थामा कांग्रेस का हाथ

कांग्रेस का दावा- जनता की आवाज हैं गरलोसा

  • चुनावी मौसम में सुरक्षा ही सबसे चर्चित

  • ट्रांसजेंडर विधेयक में पूर्वोत्तर की अनदेखी

  • आदिवासियों की जमीन उद्योगपतियों को

भूपेन गोस्वामी

गुवाहाटी: असम में 9 अप्रैल को होने वाले एक-चरण के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले राज्य की राजनीति में बड़ा उलटफेर हुआ है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व वाली सरकार में मंत्री नंदिता गरलोसा ने भाजपा का साथ छोड़कर कांग्रेस का दामन थाम लिया है। भाजपा ने इस बार दीमा हसाओ जिले की हाफलोंग सीट से मौजूदा मंत्री नंदिता गरलोसा का टिकट काटकर नए चेहरे रूपाली लांगथासा को उम्मीदवार बनाया है।

इस फैसले से नाराज होकर गरलोसा कांग्रेस में शामिल हो गईं। कांग्रेस ने अपनी उदारता दिखाते हुए इस सीट से पहले घोषित उम्मीदवार निर्मल लंगथासा का नाम वापस लेकर गरलोसा को अपना आधिकारिक प्रत्याशी बनाया है। कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा सरकार जनजातीय हितों की अनदेखी कर रही है।

इस चुनाव में भाजपा और कांग्रेस दोनों ही सुरक्षा शब्द को अपना मुख्य हथियार बना रहे हैं, लेकिन दोनों के नज़रिए अलग हैं: मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा सनातनी हिंदुओं और मूल निवासियों की सुरक्षा को प्राथमिकता दे रही है। पार्टी घुसपैठियों के खिलाफ बेदखली अभियान और सीएए के तहत नागरिकता देने को अपनी बड़ी उपलब्धि बता रही है।

उनका दावा है कि असम को बांग्लादेशी खतरों से बचाने के लिए भाजपा का सत्ता में रहना अनिवार्य है। दूसरी तरफ गौरव गोगोई के नेतृत्व में कांग्रेस बोर असोम (बृहत्तर असम) की अवधारणा पेश कर रही है, जो धर्मनिरपेक्षता और समावेशी सुरक्षा पर आधारित है। कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा धर्म के नाम पर लोगों को बाँट रही है और असली सुरक्षा सभी समुदायों को साथ लेकर चलने में है।

इसी बीच, केंद्र सरकार द्वारा ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 में प्रस्तावित संशोधनों ने पूर्वोत्तर में एक नई बहस छेड़ दी है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि प्रस्तावित बदलाव मेनलैंड इंडिया की पहचान (जैसे किन्नर, हिजड़ा) तक सीमित हैं और पूर्वोत्तर की विविध सांस्कृतिक जेंडर पहचानों को नजरअंदाज करते हैं।

इसके अलावा, मेडिकल हस्तक्षेप को पहचान बदलने के लिए अनिवार्य बनाना इस दुर्गम क्षेत्र के लोगों के लिए एक बड़ी बाधा साबित होगा। असम की यह चुनावी लड़ाई अब केवल सत्ता की नहीं, बल्कि पहचान, सुरक्षा और समावेशी अधिकारों के संघर्ष में तब्दील हो गई है।