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सुबह शुभेंदु अधिकारी के साथ भाजपा में शाम को टीएमसी में वापसी

नंदीग्राम में दल-बदल का दिलचस्प खेल

  • एक दिन में दो बार दलबदल

  • हाई-वोल्टेज चुनावी समीकरण

  • उत्तर बैरकपुर में भी सेंधमारी

राष्ट्रीय खबर

कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में नंदीग्राम हमेशा से ही सबसे हाई-प्रोफाइल और चर्चा का केंद्र रहा है। 2026 के विधानसभा चुनाव के करीब आते ही यहाँ दलबदल की राजनीति ने एक नया और अजीबोगरीब मोड़ ले लिया है। रविवार को नंदीग्राम-2 ब्लॉक के बोयाल इलाके में एक ऐसी घटना घटी जिसने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी-तीन तृणमूल कार्यकतार्ओं ने एक ही दिन में दो बार पाला बदला

रविवार दोपहर को तृणमूल कांग्रेस के तीन कार्यकर्ता-शेख साइबुल, जाने आलम और शेख शाहजहां-भाजपा के दिग्गज नेता और स्थानीय विधायक शुभेंदु अधिकारी की उपस्थिति में भगवा झंडा थामकर भाजपा में शामिल हुए। लेकिन यह कमल का साथ ज्यादा देर नहीं टिका। सूरज ढलने से पहले ही इन तीनों का मन बदल गया। शाम होते-होते इन्होंने भाजपा का झंडा छोड़ दिया और नंदीग्राम से तृणमूल के उम्मीदवार पवित्र कर के हाथों फिर से तृणमूल का दामन थाम लिया।
वापसी के बाद इन कार्यकतार्ओं ने दावा किया कि उन्हें गुमराह करके भाजपा में शामिल कराया गया था और अपनी गलती का एहसास होते ही वे अपनी पुरानी पार्टी में लौट आए।
2021 के चुनाव में नंदीग्राम ने ममता बनर्जी बनाम शुभेंदु अधिकारी की ऐतिहासिक जंग देखी थी, जिसका मामला अभी भी अदालत में है। इस बार भी यह सीट उतनी ही महत्वपूर्ण है। भाजपा ने यहाँ से फिर से शुभेंदु अधिकारी को मैदान में उतारा है, जबकि तृणमूल कांग्रेस ने उनके ही पूर्व करीबी पवित्र कर पर दांव खेला है।
दिलचस्प बात यह है कि पवित्र कर भाजपा के जिला उपाध्यक्ष थे, जिन्हें तृणमूल ने अपने पाले में लाकर टिकट दिया। इसके तुरंत बाद उनकी पत्नी शिउली कर, जो भाजपा की पंचायत प्रधान हैं, उन्होंने भी तृणमूल का हाथ थाम लिया
नंदीग्राम के अलावा उत्तर बैरकपुर नगर पालिका में भी तृणमूल को झटका लगा है। यहाँ की पार्षद श्रावणी कश्यप और उनके पति मृण्मय कश्यप (जो पूर्व मंत्री ज्योतिप्रिय मल्लिक के करीबी माने जाते थे) आधिकारिक तौर पर भाजपा में शामिल हो गए हैं। श्रावणी ने काफी समय पहले ही तृणमूल में अपमानित होने का दावा करते हुए बगावती सुर अपना लिए थे।
नंदीग्राम में जारी यह आया राम, गया राम की राजनीति दशार्ती है कि आगामी चुनावों के लिए दोनों ही दल अपना आधार मजबूत करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। एक ही दिन में दो बार दल बदलना राज्य की अस्थिर राजनीतिक निष्ठा का एक बड़ा उदाहरण बन गया है।