आज के दौर में जब हम सुबह की चाय पीते हैं, तो प्याली में शक्कर से ज्यादा खाड़ी देशों के तनाव की कड़वाहट घुली होती है। ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते युद्ध के बादल केवल आसमान में नहीं, बल्कि हमारे रसोई गैस के सिलेंडर और पेट्रोल की टंकियों में मंडरा रहे हैं। वैश्विक ऊर्जा संकट अब केवल अर्थशास्त्रियों की फाइलों का हिस्सा नहीं रहा, बल्कि यह एक ऐसा इश्क बन गया है जिसमें आशिक (जनता) हमेशा लुटता ही है।
भारत की वर्तमान राजनीति में भी एक अजीब सा विरोधाभास है। एक तरफ विश्वगुरु बनने की तड़प है, तो दूसरी तरफ कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के आगे बेबसी। जब एक आम भारतीय नागरिक अपनी पुरानी स्कूटर की खाली टंकी को देखता है, तो उसे अंतरराष्ट्रीय संबंधों की जटिलता समझ नहीं आती, उसे बस संगीतकार इस्माइल दरबार की वह धुन और केके की वह आवाज सुनाई देती है जो सीधे उसके खाली बटुए से निकलती है। कल्पना कीजिए, एक मध्यमवर्गीय व्यक्ति पेट्रोल पंप पर खड़ा है। मीटर की सुई बिजली की गति से भाग रही है और उसकी जेब से नोट ऐसे उड़ रहे हैं जैसे सूखे पत्ते।
सवाल उस विकास और वैश्विक अर्थव्यवस्था से है, जिसके वादे हर चुनाव में किए जाते हैं। वह नागरिक सोचता है कि उसने आखिर ऐसा क्या गुनाह किया था? क्या उसका गुनाह सिर्फ इतना था कि उसने एक ऐसी गाड़ी खरीदी जिसे चलने के लिए उसी तेल की जरूरत है जो अब ईरान के मिसाइल परीक्षणों की भेंट चढ़ रहा है?
इसी बात पर फिल्म हम दिल दे चुके सनम का यह गीत याद आता है। इसे लिखा था महबूब ने और संगीत में ढाला था इस्माइल दरबार ने। इसे केके ने अपना स्वर प्रदान किया था। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।
तड़प तड़प के इस दिल से आह निकलती रही
मुझको सजा दी प्यार की, ऐसा क्या गुनाह किया
तो लुट गए, हाँ लुट गए, हम लुट गए
तुम्हारी मोहब्बत में
तड़प तड़प के इस दिल से आह निकलती रही
मुझको सजा दी प्यार की, ऐसा क्या गुनाह किया
तो लुट गए, हाँ लुट गए, हम लुट गए
तुम्हारी मोहब्बत में
अजब है इश्क यारा, पल दो पल की खुशियाँ
गम के खज़ानें मिलते हैं, फिर मिलती हैं तन्हाइयाँ
कभी आंसू, कभी आहें, कभी शिकवे, कभी नाले
तेरा चेहरा नज़र आए, तेरा चेहरा नज़र आए
मुझे दिन रात तड़पाए,
तड़प तड़प के इस दिल से आह निकलती रही
मुझको सजा दी प्यार की, ऐसा क्या गुनाह किया
तो लुट गए, हाँ लुट गए, हम लुट गए
अकेला छोड़ गया तू, कहाँ वो प्यार के वादे कहाँ
वो कसमें-रस्में, कहाँ वो सब नेक इरादे
भरी दुनिया में क्या हमको, अकेले ही है जीना
तेरा चेहरा नज़र आए, तेरा चेहरा नज़र आए
मुझे दिन रात तड़पाए, तड़प तड़प के
इस दिल से आह निकलती रही
मुझको सजा दी प्यार की,
ऐसा क्या गुनाह किया तो लुट गए,
हाँ लुट गए, हम लुट गए तुम्हारी मोहब्बत में…
वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें गिरती हैं, तो पल दो पल की खुशियाँ मिलती हैं। सरकारें बड़े-बड़े विज्ञापनों में राहत का दावा करती हैं, लेकिन जैसे ही ईरान की खाड़ी में एक टैंकर रुकता है, खुशियाँ काफूर हो जाती हैं और गम के खजाने यानी महंगाई दर के आंकड़े सामने आ जाते हैं। जनता के पास बस तन्हाइयाँ बचती हैं—खाली बैंक बैलेंस की तन्हाई।
यहाँ चेहरा किसी महबूब का नहीं, बल्कि उन डॉलर और बैरल के बढ़ते ग्राफ का है, जो रात को सोते समय भी सपने में आकर डराते हैं। ऊर्जा संकट ने हमारी रातों की नींद और दिन का चैन छीन लिया है। सरकारें आत्मनिर्भरता की बात करती हैं, लेकिन हमारी सुई आज भी उसी आयातित तेल पर अटकी है।
विदेशी कूटनीति की मेज पर बैठे लोग जब रणनीतिक स्वायत्तता की बात करते हैं, तो पीछे मुड़कर उन प्यार के वादों को भूल जाते हैं जो आम जनता से किए गए थे। जनता पूछ रही है कि जब कच्चे तेल की कीमतें कम थीं, तब तो फायदे की मलाई कंपनियों और टैक्स के रूप में सरकार ने खाई, लेकिन जब युद्ध की मार पड़ी, तो अकेला छोड़ दिया गया? वह नेक इरादे कहाँ गए कि महंगाई को काबू में रखा जाएगा? क्या इस भरी दुनिया के बीच भारतीय मध्यम वर्ग को अकेले ही इस आर्थिक बोझ के साथ जीना होगा?
अंततः, यह वैश्विक राजनीतिक संकट और हमारी घरेलू मजबूरियाँ हमें उसी मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती हैं जहाँ केवल एक ही सच बचता है—जनता लुट रही है और व्यवस्था अपनी ही धुन में मगन है।