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ये कहां आ गये हम यूं ही साथ चलते चलते.. .. ..

ये कहां आ गये यानी देश दरअसल किधर जा रहा है। एक तरफ पापा यूक्रेन का युद्ध रुकवा रहे हैं तो यहां अपने विरोध में उठने वाले हर स्वर को दबाने में परेशान हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी नेता अरविंद केजरीवाल की ईडी द्वारा गिरफ्तारी भारत के लोकतंत्र और संघवाद की दिशा पर परेशान करने वाले सवाल उठाती है।

आम चुनाव से पहले विपक्ष के एक प्रमुख नेता और एक सेवारत मुख्यमंत्री की गिरफ्तारी का राजनीतिक इरादा स्पष्ट है। दिल्ली उत्पाद शुल्क नीति मामला, जिसमें श्री केजरीवाल को गिरफ्तार किया गया है, अगस्त 2022 में सीबीआई द्वारा दर्ज किया गया था, जिसके आधार पर ईडी ने अपनी मनी लॉन्ड्रिंग जांच शुरू की थी। फरवरी 2023 से मनीष सिसौदिया, और अक्टूबर 2023 से संजय सिंह पहले से जेल में हैं। अभियुक्तों को जेल में रख जांचकर्ता अपना खोजी अभियान जारी रखे हुए हैं।

आम जनता को जो चीजें बिल्कुल साफ साफ दिखाई दे रही हैं, वह अदालतों को क्यों नहीं दिखती, इस बात पर भी हैरानी है।  जब आरोपी सत्तारूढ़ दल के राजनीतिक विरोधी हों, तो गिरफ्तारियों को कानून के चयनात्मक कार्यान्वयन के रूप में देखा जाएगा और लोकतंत्र में जनता के विश्वास को कम किया जाएगा। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने पहले ईडी से सबूतों की एक अटूट श्रृंखला प्रदान करने के लिए कहा लेकिन सिसौदिया को जमानत देने से इनकार कर दिया।

इसी बात पर एक सुपरहिट फिल्म सिलसिला का  यह गीत याद आ रहा है। इस गीत को लिखा था जावेद अख्तर ने और संगीत में ढाला था शिव हरि ने। वर्ष 1981 की इस फिल्मी गीत को गाया था लता मंगेशकर और अमिताभ बच्चन ने। गीत के बोल इस तरह हैं।

मैं और मेरी तनहाई, अक्सर ये बातें करते हैं
तुम होती तो कैसा होता
तुम ये कहती, तुम वो कहती
तुम इस बात पे हैरां होती
तुम उस बात पे कितना हँसती
तुम होती तो ऐसा होता, तुम होती तो वैसा होता
मैं और मेरी तनहाई, अक्सर ये बातें करते हैं
ये कहाँ आ गए हम, यूँ ही साथ साथ चलते
तेरी बाहों में ऐ जानम, मेरे जिस्म-ओ-जां पिघलते
ये रात है या, तुम्हारी ज़ुल्फें खुली हुई है
है चांदनी या तुम्हारी नज़रों से मेरी रातें धुली हुई है
ये चाँद है या तुम्हारा कंगन
सितारें है या तुम्हारा आँचल
हवा का झौंका है, या तुम्हारे बदन की खुशबू
ये पत्तियों की है सरसराहट
के तुमने चुपके से कुछ कहा है
ये सोचता हूँ, मैं कब से गुमसुम
के जब के, मुझको को भी ये खबर है
के तुम नहीं हो, कही नहीं हो
मगर ये दिल है के कह रहा है
तुम यहीं हो, यहीं कहीं हो
तू बदन है, मैं हूँ छाया, तू ना हो तो मैं कहाँ हूँ
मुझे प्यार करनेवाले, तू जहाँ है मैं वहाँ हूँ
हमें मिलना ही था हमदम, किसी राह भी निकलते
मेरी सांस सांस महके, कोई भीना भीना चन्दन
तेरा प्यार चांदनी है, मेरा दिल है जैसे आँगन
हुई और भी मुलायम, मेरी शाम ढलते ढलते
मजबूर ये हालात, इधर भी है, उधर भी
तनहाई की एक रात, इधर भी है, उधर भी
कहने को बहुत कुछ है, मगर किससे कहें हम
कब तक यूँ ही खामोश रहे हम और सहे हम
दिल कहता है दुनिया की हर इक रस्म उठा दें
दीवार जो हम दोनों में है, आज गिरा दें
क्यों दिल में सुलगते रहे, लोगों को बता दें
हाँ हमको मोहब्बत है, मोहब्बत है, मोहब्बत
अब दिल में यही बात, इधर भी है, उधर भी

यह पहली बार नहीं है कि कोई केंद्रीय एजेंसी किसी संवैधानिक पदाधिकारी के पीछे गई है। ईडी द्वारा गिरफ्तारी से पहले हेमंत सोरेन ने झारखंड के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। जैसे हालात हैं, इस देश की लोकतांत्रिक राजनीति को केंद्रीय एजेंसियों द्वारा ठप किया जा सकता है, भले ही न्यायालय और भारत का चुनाव आयोग इस सब को नियमित कानून प्रवर्तन के रूप में मानता रहे।

यह बहाना कि कानून अपना काम कर रहा है, किसी भी समझदार व्यक्ति के लिए विश्वसनीय नहीं होगा। यह कोई संयोग नहीं है कि केंद्रीय एजेंसियां भ्रष्टाचार के आरोप में केवल विपक्षी नेताओं को ही गिरफ्तार कर रही हैं, और यहां तक कि जिन नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं, उन्हें भी भारतीय जनता पार्टी से हाथ मिलाते ही छोड़ दिया जाता है।

तो क्या यह मान लिया जाए कि अदालतें भी भयभीत होती हैं और वहां भी न्याय के सिद्धांतों को नफा नुकसान के तराजू पर अब तौला जाने लगा है। इतना कुछ होने के बाद भी हर किसी को, जिसमें अदालतें भी शामिल है कि वह भारत के आम आदमी को हल्के में ना ले। यह आम आदमी कभी भी कुछ भी कर सकता है।