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पश्चिम एशिया में लगातार भड़क रहे युद्ध को देखकर आम तौर पर सबसे पहला डर पेट्रोल और डीजल की कीमतों को लेकर सताता है. लेकिन संकट की जड़ें इससे कहीं ज्यादा गहरी हैं. जब दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों पर तोपों की गड़गड़ाहट गूंजती है, तो इसका असर केवल ईंधन तक सीमित नहीं रहता. मार्केट एक्सपर्ट आकाश जिंदल के मुताबिक, अगर यह सैन्य तनाव लंबा खिंचता है, तो रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी कई अहम चीजों की वैश्विक सप्लाई चेन टूट सकती है. इसका सीधा मतलब है कि खेती-किसानी से लेकर मोबाइल फोन और मकान बनाने तक का खर्च बढ़ सकता है.

होर्मुज जलडमरूमध्य का रास्ता बंद

फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ने वाला ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (Strait of Hormuz) दुनिया के व्यापार की रणनीतिक जीवन रेखा माना जाता है. खाड़ी देशों से निकलने वाला कच्चा तेल ही नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर औद्योगिक कच्चा माल और गैस भी इसी रास्ते से पूरी दुनिया के अलग-अलग कोनों में पहुंचाई जाती है. युद्ध की वजह से अगर इस इलाके में मालवाहक जहाजों की आवाजाही पर ब्रेक लगता है, तो वैश्विक बाजार में अफरा-तफरी मचना लगभग तय है. चीजों की अंतरराष्ट्रीय सप्लाई घटेगी और स्वाभाविक रूप से उन पर कीमतों का भारी दबाव बनेगा.

निर्माण से लेकर खेती तक बढ़ेगी लागत

इस तनाव का सबसे पहला और बड़ा शिकार एल्युमिनियम सेक्टर हो सकता है. खाड़ी क्षेत्र एल्युमिनियम उत्पादन का एक बेहद महत्वपूर्ण केंद्र है. हम जो गाड़ियां चलाते हैं, जो मकान बनाते हैं या यहां तक कि खाने-पीने की चीजों की जो पैकेजिंग होती है, उन सबमें एल्युमिनियम का व्यापक इस्तेमाल होता है. अगर वहां से शिपमेंट रुकती है, तो उद्योगों की लागत बढ़ेगी और अंततः इसका आर्थिक बोझ ग्राहकों तक ही पहुंचेगा.

बिल्कुल यही स्थिति फर्टिलाइजर यानी उर्वरक सेक्टर की है. यूरिया और इसे बनाने में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल ‘सल्फर’ (sulphur) की वैश्विक सप्लाई में मिडिल ईस्ट का भारी दबदबा है. समुद्री व्यापार बाधित होने से इन कृषि उत्पादों की किल्लत हो सकती है. अगर खाद महंगी हुई, तो सीधे तौर पर खेती की लागत में इजाफा होगा.

हाई-टेक इंडस्ट्री तक पहुंचेगी आंच

इस भू-राजनैतिक संकट का असर एक और जरूरी कमोडिटी हीलियम पर भी पड़ सकता है. खाड़ी क्षेत्र, विशेषकर कतर, हीलियम गैस का बहुत बड़ा उत्पादक है. हीलियम का इस्तेमाल एमआरआई (MRI) मशीनों, वैज्ञानिक रिसर्च और सबसे अहम, सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग में होता है. क्षेत्रीय ऊर्जा ढांचे को नुकसान पहुंचने पर दुनिया भर की हाई-टेक इंडस्ट्री की सप्लाई चेन चरमरा सकती है.

इसके साथ ही, युद्ध के कारण चीनी और एथेनॉल के बाजार में भी बड़े उतार-चढ़ाव की आशंका है. अर्थशास्त्र का सीधा नियम है कि जब कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूती हैं, तो कई देश ईंधन के तौर पर इस्तेमाल के लिए गन्ने से एथेनॉल बनाने की प्रक्रिया तेज कर देते हैं. ऐसा होने पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीनी की उपलब्धता घट जाती है और इसके दामों में तेजी आ सकती है.

भारतीय बाजारों का क्या है हाल?

राहत की बात यह है कि भारतीय बाजारों में अभी इस अंतरराष्ट्रीय तनाव का कोई फौरी असर नहीं दिख रहा है. हमारा देश चीनी और एल्युमिनियम जैसे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर खुद उत्पादन करता है, इसलिए तुरंत किसी भारी किल्लत की आशंका नहीं है. लेकिन, उर्वरक और कई औद्योगिक कच्चे माल के लिए भारत भी वैश्विक सप्लाई चेन पर निर्भर है. अगर होर्मुज जलडमरूमध्य का रास्ता लंबे समय तक प्रभावित रहता है, तो अप्रत्यक्ष रूप से भारतीय उद्योगों और बाजारों पर भी महंगाई का दबाव बनेगा. वर्तमान कीमतों पर नजर डालें, तो घरेलू बाजार अभी काफी स्थिर है.

  1. एल्युमिनियम: ₹330 से ₹345 प्रति किलो
  2. यूरिया (सरकार नियंत्रित): ₹266₹270 (प्रति 45 किलो बैग)
  3. सल्फर (औद्योगिक): ₹18 से ₹25 प्रति किलो
  4. हीलियम गैस: ₹800 से ₹1200 प्रति क्यूबिक मीटर
  5. चीनी (खुदरा बाजार): ₹40 से ₹45 प्रति किलो
  6. एथेनॉल (सरकारी खरीद दर): लगभग ₹65 से ₹72 प्रति लीटर

भारत के लिए फिलहाल स्थितियां काबू में हैं. इसे अभी एक ‘संभावित आर्थिक जोखिम’ के रूप में देखा जा रहा है. लेकिन अगर पश्चिम एशिया का यह संघर्ष लंबा चला, तो इसके आर्थिक झटके वैश्विक बाजार से होते हुए भारत के उपभोक्ता तक जरूर महसूस किए जाएंगे.