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यूरोपीय सेंट्रल बैंक में ब्याज दरों में कटौती नहीं

वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता का असर अब यूरोप पर

फ्रैंकफर्ट: यूरोपीय सेंट्रल बैंक के वरिष्ठ अधिकारियों ने आज एक महत्वपूर्ण प्रेस ब्रीफिंग में वैश्विक अर्थव्यवस्था को लेकर अपनी प्राथमिकताओं को स्पष्ट कर दिया है। बैंक ने कड़े शब्दों में संकेत दिया है कि जब तक महंगाई दर अपने 2 प्रतिशत के निर्धारित लक्ष्य तक नहीं पहुँच जाती, तब तक ब्याज दरों में किसी भी प्रकार की कटौती की संभावना शून्य है।

ईसीबी के इस कठोर रुख ने उन निवेशकों को निराश किया है, जो आर्थिक विकास को गति देने के लिए मौद्रिक नीति में ढील की उम्मीद कर रहे थे। इस घोषणा के तत्काल बाद वैश्विक वित्तीय बाजारों में हड़कंप मच गया। यूरोपीय शेयर बाजारों के साथ-साथ एशियाई बाजारों में भी तेज गिरावट दर्ज की गई। निवेशकों को उम्मीद थी कि केंद्रीय बैंक ऊंची दरों से राहत देगा, लेकिन ईसीबी द्वारा वेट एंड वॉच की नीति अपनाने से बाजार की धारणा नकारात्मक हो गई है।

बैंक की प्रमुख क्रिस्टीन लेगार्ड के करीबी सूत्रों और आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि महंगाई को नियंत्रित करना अभी भी एक बड़ी चुनौती है। इसके पीछे दो मुख्य कारण हैं। रूस-यूक्रेन संघर्ष के दीर्घकालिक प्रभाव के कारण ऊर्जा की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव हो रहा है। युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव ने कच्चे माल की आपूर्ति में बाधा उत्पन्न की है, जिससे उत्पादन लागत ऊँची बनी हुई है।

ब्याज दरों के ऊंचे स्तर पर बने रहने का सबसे सीधा और नकारात्मक प्रभाव ऑटोमोबाइल और रियल एस्टेट जैसे क्षेत्रों पर पड़ेगा, जो ऋण पर अत्यधिक निर्भर हैं। महंगा कर्ज उपभोक्ता मांग को कम कर सकता है, जिससे इन क्षेत्रों में मंदी की संभावना बढ़ जाती है। यह निर्णय केवल यूरोपीय सीमाओं तक सीमित नहीं है। वैश्विक व्यापार में डॉलर और यूरो की प्रधानता के कारण, ऊँची ब्याज दरें उभरते बाजारों (जैसे भारत और दक्षिण पूर्व एशिया) के लिए खतरा पैदा करती हैं। जब विकसित बाजारों (यूरोप/यूएस) में दरें अधिक होती हैं, तो विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक अपना पैसा उभरते बाजारों से निकालकर सुरक्षित और अधिक रिटर्न वाले विकसित बाजारों की ओर ले जाते हैं।

अर्थशास्त्रियों के एक बड़े वर्ग का मानना है कि ईसीबी की यह कठोर मुद्रास्फीति-विरोधी नीति यूरोप को तकनीकी मंदी की ओर धकेल सकती है। हालांकि, बैंक ने स्पष्ट किया है कि उसका प्राथमिक और एकमात्र लक्ष्य फिलहाल कीमतों में स्थिरता लाना है, भले ही इसके लिए विकास की गति को कुछ समय के लिए कुर्बान करना पड़े। अब पूरी दुनिया की नजरें अमेरिकी फेडरल रिजर्व के अगले कदम पर टिकी हैं, क्योंकि ईसीबी का यह फैसला वैश्विक मौद्रिक नीतियों की दिशा तय करने में बड़ी भूमिका निभाएगा।