Breaking News in Hindi

याचिकाकर्ताओं के सवाल से फिर परेशानी में चुनाव आयोग

पूछा, क्या देशव्यापी विशेष गहन पुनरीक्षण जरूरी था

  • बंगाल के बाद तमिलनाडु का भी नाम

  • बिहार का उदाहरण और अवैध अप्रवासी

  • किसी का लोकतांत्रिक अधिकार छीन गया

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः सुप्रीम कोर्ट में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने भारतीय चुनाव आयोग की मंशा और तैयारी पर सवाल उठाते हुए पूछा कि क्या आयोग ने यह साबित करने के लिए कोई ठोस आंकड़े पेश किए हैं कि वार्षिक अपडेट के बावजूद इस तरह के राष्ट्रव्यापी गहन अभियान की तत्काल आवश्यकता क्यों थी। केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के विपक्षी दलों की ओर से पैरवी करते हुए सिब्बल ने चुनाव आयोग के उन तर्कों का जवाब दिया, जो पिछले कई दिनों से एसआईआर के पक्ष में दिए जा रहे थे।

सिब्बल ने तर्क दिया कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था को एक विस्तृत अध्ययन पर आधारित डेटा प्रदान करना चाहिए था, जिससे यह स्पष्ट होता कि SIR प्रक्रिया अनिवार्य थी। उन्होंने सवाल उठाया कि मतदाता सूची में जोड़े गए लोगों की संख्या को लेकर पारदर्शिता कहाँ है?

जब मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि आयोग केवल उन मामलों में दस्तावेज मांग रहा है जहाँ मतदाता अपना नाम 2002 की सूची से जोड़ने में असमर्थ हैं, तो सिब्बल ने तीखा सवाल किया। उन्होंने पूछा कि देश में कितने लोगों के पास अपने या अपने माता-पिता के जन्म प्रमाण पत्र उपलब्ध होंगे? उन्होंने दावा किया कि इस प्रक्रिया के जरिए 1.82 करोड़ लोगों की नागरिकता पर सवाल खड़े कर दिए गए हैं।

एनजीओ एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने हाशिए पर रहने वाले लोगों की स्थिति पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि मतदाता सूची में नाम होना केवल वोट देने का अधिकार नहीं, बल्कि नागरिकता और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा का एकमात्र आधार है। उन्होंने अमेरिका की इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट जैसी कड़ी कार्रवाइयों का उदाहरण देते हुए आगाह किया कि बिना दस्तावेजी साक्ष्य के लोगों को विदेशी घोषित किए जाने का डर सता रहा है।

सुनवाई के दौरान सिब्बल ने बिहार का उदाहरण देते हुए पूछा कि जब वहां पूरी प्रक्रिया पूरी कर ली गई थी, तो अंततः कितने अवैध अप्रवासी मिले? उनका इशारा इस ओर था कि बिना पर्याप्त आधार के इतने बड़े पैमाने पर नागरिकों की पहचान को संदिग्ध श्रेणी में डालना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। याचिकाकर्ताओं का मूल तर्क यह है कि मतदाता सूची में एक छोटा सा बदलाव या नाम का कटना किसी व्यक्ति के इस देश का हिस्सा होने के अधिकार को छीन सकता है।