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यमन में फिर से युद्ध की आहट आने लगी है

सरकार हूतियों पर हमले की तैयारी में

अदन: यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार द्वारा अपनी सेना को हाई अलर्ट पर रखने और अग्रिम मोर्चों की ओर बढ़ने का आदेश इस बात का संकेत है कि अब शांति वार्ताओं का दौर समाप्त होकर युद्ध के नगाड़े बजने वाले हैं। ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के खिलाफ एक व्यापक सैन्य अभियान की रूपरेखा तैयार हो चुकी है, जिसका प्रभाव केवल यमन तक सीमित नहीं रहेगा। यमन सरकार के इस कड़े रुख के पीछे मुख्य कारण हूतियों द्वारा लाल सागर में अंतरराष्ट्रीय जहाजों पर किए जा रहे लगातार हमले हैं।

यमनी सरकारी सेना को उम्मीद है कि अमेरिका और ब्रिटेन द्वारा संचालित ऑपरेशन प्रोस्पेरिटी गार्डियन के तहत होने वाले हवाई हमले हूतियों की मिसाइल और ड्रोन क्षमता को कमजोर कर देंगे। इससे जमीनी सेना को हूतियों के मजबूत गढ़ों, जैसे होदेइदा बंदरगाह, में घुसने का मौका मिलेगा।

राष्ट्रपति परिषद का मानना है कि हूतियों ने पिछले युद्धविराम का उपयोग अपनी सेना को पुनः संगठित करने और ईरान से नए हथियार प्राप्त करने के लिए किया है। सैन्य हलचल का मुख्य केंद्र होदेइदा है। यह बंदरगाह यमन के लिए जीवनरेखा की तरह है, क्योंकि देश का 80 फीसद भोजन और सहायता यहीं से आती है।

यदि सरकारी सेना होदेइदा पर नियंत्रण करने में सफल रहती है, तो हूतियों की आर्थिक कमर टूट जाएगी। इसके साथ ही, राजधानी साना के आसपास भी घेराबंदी तेज कर दी गई है। सरकारी कमांडरों का मानना है कि हूतियों को बातचीत की मेज पर लाने का एकमात्र तरीका उन पर सैन्य दबाव बनाना है। यमन का यह संघर्ष केवल एक आंतरिक गृहयुद्ध नहीं रह गया है। हूतियों के हमलों के कारण स्वेज नहर के माध्यम से होने वाला व्यापार पहले से ही प्रभावित है। यदि पूर्ण युद्ध शुरू होता है, तो बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य पूरी तरह बंद हो सकता है।

पश्चिम एशिया में अस्थिरता का सीधा अर्थ है वैश्विक बाजारों में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल, जिससे भारत सहित कई देशों की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, यमन पहले से ही 21वीं सदी के सबसे बड़े मानवीय संकट से गुजर रहा है। यमन की 70 प्रतिशत से अधिक आबादी को मानवीय सहायता की आवश्यकता है। एक नया युद्ध लाखों लोगों को फिर से बेघर कर देगा।

यमन की सरकार के पास खोने के लिए बहुत कुछ है, लेकिन हूतियों की बढ़ती आक्रामकता ने उन्हें इस आर-पार की लड़ाई के लिए मजबूर कर दिया है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या सऊदी अरब और यूएई इस बार सीधी सैन्य भागीदारी करेंगे या वे केवल पर्दे के पीछे से समर्थन देंगे।