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बंदूक थामने वाले हाथ कर रहे सुई धागे से कलाकारी, पूर्व नक्सलियों का नया जीवन, पूना मारगेम बना सबसे बड़ा साथी

नारायणपुर : सिलाई मशीन में कपड़ों को आकार देते हाथ, मशीन के चक्के को आगे बढ़ाते पैर और मशीन के आवाज के बीच चेहरे पर शांति का भाव. ये दृश्य अमूमन किसी कपड़े फैक्ट्री का लगता है, जहां आम दिन की तरह प्रोडक्शन का काम चलते रहता है. लेकिन ये दृश्य जहां के हैं, वहां का माहौल थोड़ा जुदा है. जिन हाथों ने सुई और धागों की कलाकारी की है, वो कोई आम लोगों के हाथ नहीं बल्कि नक्सल क्रांति में कंधे से कंधे मिलाकर चलने वाले पूर्व नक्सलियों की कारीगरी है. ये सब कुछ मुमकिन हो सका है सरकार की सकारात्मक सोच और फोर्स के भरोसे की बदौलत.आईए जानते हैं आखिर किस तरह से हिंसा की आग में झुलस चुके पन्नों की राख को समेटकर पूर्व नक्सली भविष्य की स्याही से अपनी किस्मत लिख रहे हैं.

133 आत्मसमर्पित नक्सलियों का स्किल डेवलेपमेंट

छत्तीसगढ़ का नारायणपुर जिला कभी नक्सलियों के आतंक का पर्याय था. इस जिले के दुर्गम इलाकों में नक्सलियों की तूती बोलती थी.लेकिन आज जिला मुख्यालय के करीब लाइवलीहुड कॉलेज और फील्ड डेवलेपमेंट सेंटर कुछ और कहानी बयां कर रहा है. इस सेंटर में 133 आत्मसमर्पित नक्सलियों ने स्किल डेवलपमेंट की ट्रेनिंग ली है. मौजूदा समय में 110 पूर्व नक्सली सिलाई, जल वितरक, ड्राइविंग के लिए ट्रेनिंग ले रहे हैं. इनमें से 70 आत्मसमर्पित नक्सलियों के ट्रेनिंग का भुगतान भी दिया जा चुका है ताकि वह अपने स्वरोजगार के लिए आगे कुछ कर सकें.

बंदूक वाले हाथों में सिलाई धागों की कलाकारी

नारायणपुर के लाइवलीहुड कॉलेज में इन आत्मसमर्पित नक्सलियों को कौशल विकास की ट्रेनिंग मिल रही है. लाइवलीहुड में आवासीय सुविधा उपलब्ध है, जहां रहकर सभी नियमित प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं. वर्तमान में उन्हें सिलाई का प्रशिक्षण स्थानीय VTP संस्थान उपलब्ध करा रही है. जो हाथ कभी बंदूक और गोली के वजन को ढोया करते थे,उन्हीं हाथों ने आज धागा और सुई से रिश्ता बनाया है. जो पैर कभी जंगलों की खाक छाना करते थे,वो पैर आज सिलाई मशीन के पैडल पर अपनी कलाकारी दिखा रहे हैं. सिलाई मशीन चलाकर आत्मसमर्पित नक्सली खुद अपने पैरों पर खड़ा होने की तैयारी कर रहे हैं.किसी के हाथों में बच्ची की ड्रेस है ,तो कोई शर्ट और पैंट बनाकर खुद को आत्मनिर्भर बना रहा है. साड़ी में फॉल लगाना हो या फिर ब्लाउज सिलकर उसमें कलाकारी करना,अब ये किसी भी काम में पीछे नहीं हैं. ट्रेनिंग सेंटर में हथियार छोड़ने के बाद पहुंची ज्योति बड्डे का कहना है कि यहां ट्रेनिंग लेकर अच्छा लग रहा है. ट्रेनिंग के बाद घर जाएंगे और सिलाई का काम करेंगे और जीवन यापन करेंगे

विशेष ट्रेनिंग देकर बना रहे आत्मनिर्भर

यहां ट्रेंनिंग लेने वाले आत्मसमर्पित नक्सली पुनर्वास नीति के तहत दक्ष बन रहे हैं. प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना और मुख्यमंत्री कौशल विकास योजना के बूते पुनर्वास नीति के तहत सरेंडर करने वाले नक्सलियों को विशेष निगरानी और सुरक्षा देकर नई राह चुनने में मदद की जा रही है. यहां पर ट्रेनिंग ले रहे पूर्व नक्सलियों में कोई एरिया कमांडर था,कोई सप्लायर था तो कोई नाच गाकर नक्सली विचारधारा को अंदरूनी क्षेत्रों में पहुंचाते थे.लक्ष्मी मंडावी उन्हीं नक्सलियों में से एक हैं, जिन्होंने नक्सली विचारधारा के प्रचार प्रसार का काम किया था. लक्ष्मी गांव-गांव टोलियों के साथ जाती थी और ज्यादा से ज्यादा लोगों को नक्सली संगठन में जुड़ने के लिए नाच गाने से प्रेरित करती थी. ऐसा कहा जाता है कि संगीत सबसे पहले इंसानी दिमाग को कैप्चर करता है,शायद यही वजह है कि नक्सलियों ने अपने आंदोलन को हर घर तक पहुंचाने के लिए संगीत को माध्यम बनाया.लेकिन अब लक्ष्मी को अपनी गलती का अहसास हो चुका है और वो फिर से नया जीवन शुरु करने की तैयारी कर रही हैं.

बंदूक की बोली समझाने वाले अब कारीगरी के मुरीद

लाइवलीहुड में ट्रेनिंग लेने वाले पूर्व नक्सलियों ने एक सुर में कहा है कि वो अपने घर जाकर खेती किसानी के साथ सिलाई के काम को करेंगे.इसी से आमदनी जुटाएंगे और फिर कभी गलत रास्ते में नहीं चलेंगे. ऐसे ही नक्सली चैतराम उसेंडी और बुझया सलाम भी हैं. चैतराम उसेंडी की मानें तो पहले हथियार के साथ जब वो गांव जाते थे तो लोग डरते थे.कोई भी डर के कारण उनसे बात नहीं करता था.संगठन में लोग उन्हें बताते थे कि इससे ही आगे का भविष्य संवरेगा.वहीं दूसरी ओर बुझया सलाम ने कहा कि उनके पति ने सरेंडर कर दिया था,लेकिन उन्होंने थोड़ी देरी की. आखिरकार जब समझ आया कि माओवाद का रास्ता कहां जाता है तो पति की राह पर चलते हुए बंदूक छोड़ दिया.

सरेंडर करने के बाद अब जीवन में शांति

सरेंडर करने वाले नक्सलियों ने बताया कि जंगल के अंदर फोर्स की एक्टिविटी काफी बढ़ गई थी. इनमें से कई नक्सलियों ने कहा कि वो कई साल पहले ही अपने हथियार डालना चाहते थे,लेकिन संगठन के शीर्ष नेता उन्हें ऐसा करने से रोकते थे. आज उनके बीच के कई साथी इस दुनिया में नहीं हैं. फोर्स का ऑपरेशन जब बढ़ा और नक्सल से जुड़े सदस्यों को मौका मिला तो हथियार समेत पुलिस के सामने सरेंडर करने आ गए.

लाल आतंक की भट्टी में जला बचपन

नक्सलियों के हथियार डाल देने से ही सिर्फ सारी समस्या का हल नहीं होने वाला है, क्योंकि कई नक्सली समाज से कई दशक से कटे हुए हैं. नक्सल क्रांति की आग में सैकड़ों नक्सलियों ने अपना बचपन और जवानी झोंक डाली है. गुड्डे गुड़ियों से खेलने और भविष्य के सपने देखने वाली उम्र में आदिवासियों की नस्ल को लाल आतंक की भट्टी में झोंक दिया गया. इस आग में सिर्फ बचपन ही नहीं जला बल्कि जंगल के बीच में शांति से जीवन यापन करने वाले उन आदिवासियों की सोच भी जली, जिसके बूते देश के भविष्य को बदला जा सकता था. करीब 4 दशकों बाद अब छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद बैकफुट पर है. अब नक्सली जंगलों से निकलकर खुद ब खुद शांति की तलाश में सरकार की योजनाओं का लाभ उठा रहे हैं.ऐसे ही पुनर्वासित नक्सलियों को फिर से समाज की मुख्यधारा में जोड़ने के लिए नारायणपुर लाइवलीहुड में खास तरह का प्रशिक्षण दिया जा रहा है.

घर बनाकर शांति पूर्वक जीवन बिताने का सपना

नारायणपुर कलेक्टर प्रतिष्ठा ममगई कहती हैं कि पुनर्वास केंद्र में जिन 133 पुनर्वासित नक्सलियों ने पुनर्वास केंद्र से ट्रेनिंग लिया है, उनके पास दस्तावेजों की कमी थी. ज्यादातर लोगों के पास किसी भी तरह के सरकारी दस्तावेज नहीं थे. ऐसे में प्रशासन ने सबसे पहले सरेंडर करने वाले नक्सलियों के जरुरी दस्तावेज बनवाए,जिसमें आधार, वोटरआईडी और बैंक डॉक्यूमेंट्स हैं. इसके बाद सरकारी योजनाओं के तहत सभी को जोड़ा गया.अलग-अलग शासकीय योजनाओं में शामिल करने का प्रयास किया गया है. प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत पात्रता के मुताबिक घर भी स्वीकृत किया गया है. सरेंडर नक्सलियों को मुख्यधारा से जोड़ने का सभी तरह का प्रयास किया जा रहा है.

नक्सल उन्मूलन में ऐतिहासिक काम

नक्सल उन्मूलन और पुनर्वास को लेकर राज्य सरकार भी बड़ा प्रयास कर रही है. हथियार छोड़कर पुनर्वास का रास्ता चुनने वाले नक्सलियों का सरकार रेड कार्पेट बिछाकर स्वागत कर रही है. सीएम विष्णुदेव साय की माने तो छत्तीसगढ़ सरकार के कार्यकाल के दो वर्ष राज्य के इतिहास में निर्णायक मोड़ साबित हुए हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के निर्धारित लक्ष्य 31 मार्च 2026 तक पूरे देश से नक्सलवाद का पूर्ण उन्मूलन की दिशा में छत्तीसगढ़ तेजी से आगे बढ़ रहा है.नक्सलवाद की कमर टूट चुकी है और यह अब अंतिम सांसें गिन रहा है.

पिछले दो वर्षों में सुरक्षा बलों ने अभूतपूर्व सफलता हासिल की . 500 से अधिक माओवादी मुठभेड़ों में न्यूट्रलाइज हुए, जबकि 4,000 से अधिक नक्सलियों ने आत्मसमर्पण या गिरफ्तारी दी. सुरक्षा बलों के पराक्रम से बस्तर में दशकों से जमी हिंसा के विरुद्ध निर्णायक बढ़त मिली है- विष्णुदेव साय, सीएम छग

सीएम विष्णुदेव साय ने कहा कि राज्य सरकार की नई पुनर्वास नीति भी सरेंडर करने वाले नक्सलियों के लिए मददगार बन रही है. इसके तहत आत्मसमर्पित नक्सलियों के लिए 15,000 प्रधानमंत्री आवासों की स्वीकृति, 3 वर्षों तक 10,000 रुपये मासिक वित्तीय सहायता, कौशल विकास प्रशिक्षण और रोजगार-संबंधी कार्यक्रम शामिल हैं. मुख्यमंत्री ने कहा कि गोलीबारी की भाषा छोड़कर मुख्यधारा से जुड़ना अब बस्तर में हकीकत बन रहा है. पंडुम कैफे जैसे नवाचार आज सामाजिक परिवर्तन का प्रतीक हैं.

हथियार छोड़िए या फोर्स से लड़िए

सरकार ने नक्सलियों के सामने जो दो रास्ते छोड़े थे.जिसमें हथियार के साथ पुनर्वास नीति के तहत मुख्य धारा में लौटने पर उनके पुनर्उत्थान का सारा जिम्मा सरकार उठाएगी.यही नहीं जो गांव पूरी तरह से नक्सलमुक्त होंगे, उस ग्राम पंचायत को एक करोड़ की राशि डेवलेपमेंट के लिए दी जाएगी.साथ ही साथ हथियार छोड़ने वाले नक्सलियों को स्वरोजगार के साथ पीएम आवास का लाभ भी आत्मसमर्पित नक्सलियों को मिलेगा. जो दूसरा रास्ता फोर्स के साथ दो-दो हाथ करने का था, सरकार के इस ऐलान के साथ जिन नक्सलियों ने हथियार नहीं छोड़े, उनमें से कई अब दुनिया छोड़ चुके हैं,वहीं अपने शीर्ष नेताओं की मौत के बाद बचे हुए नक्सली कैडर्स ने हथियार छोड़ने में भलाई डाली है.

क्या है पूना मारगेम अभियान

पूना मारगेम अभियानछत्तीसगढ़ सरकार ने किसी जमाने में सलवा जुड़ूम अभियान चलाकर नक्सलवाद पर बड़ी चोट दी थी.सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद सलवा जुड़ूम जब बंद हुआ तो नक्सल दोगुनी तेजी से फैला.अब कई साल बाद बस्तर में फोर्स की रणनीति और सरकारी की योजनाओं के बूते शांति आई है. पूना मारगेम अभियान इसी का एक बड़ा हिस्सा है. पूना मारगेम नक्सलियों के पुनर्वास की नीति है. ये शब्द गोंडी भाषा से लिया गया है. इस शब्द का अर्थ है पुनर्वास से पुनर्जीवन. सरकार नक्सलियों को ये सिखाने में कामयाब रही है कि माओवाद की हिंसा छोड़कर ही समाज में सिर उठाकर जिया जा सकता है. यदि कोई नक्सली समाज की मुख्य धारा में लौटना चाहता है तो पूना मारगेम से बेहतर रास्ता उसके लिए नही है.सरकार की इस नीति के तहत नक्सलियों को आर्थिक सहायता, कौशल प्रशिक्षण और अन्य सुविधाएं मिलती हैं, ताकि वे विकास की प्रक्रिया का हिस्सा बन सकें.

स्थानीय भाषा में नक्सलियों के लिए दिया गया संदेश

इस अभियान के तहत हल्बी और गोंडी भाषा में बैनर पोस्टर तैयार किए गए. जिसमें संभाग के सभी जिलों में हल्बी और गोंडी भाषा में बैनर पोस्टर लगाए गए.स्थानीय भाषा को बोलने और पढ़ने में सक्षण नक्सली इस अभियान को आसानी से समझ सकें इसका भी खास ध्यान रखा गया. जो पोस्टर धुर नक्सल इलाकों में लगाए गए उनमें पुनर्वास से जुड़ी एक छोटी सी छोटी जानकारी लिखी गई.यही नहीं नक्सलियों का विश्वास जीतने के लिए एसपी समेत जिले के अन्य पुलिस अफसरों के नंबरों को भी लिखा गया,ताकि जब कभी किसी को मौका मिले वो अपनी मर्जी से बात करके हथियार समेत वापस समाज की मुख्यधारा में लौट सके.

नियाद नेल्लानार ने टूटी उम्मीदों को जोड़ा

छत्तीसगढ़ में नक्सल उन्मूलन को लेकर बड़े कार्य किए जा रहे हैं. नियाद नेल्लानार के तहत पूना मारगेम ने नक्सली विचारधारा की राह पर चलने वाले आदिवासियों के लिए गेम चेंजर बनने का काम किया है. सरकार ने पुनर्वास नीति के तहत नक्सलियों के सामने एक बड़ा मौका रखा. ये मौका था हथियार समेत सरेंडर करने और फिर पुनर्वास के तहत अपना जीवन बदलने का. सरकार ने अपने संदेश को ज्यादा से ज्यादा गांवों तक पहुंचाने के लिए स्थानीय पुलिस और ग्रामीणों का सहारा लिया. जिस क्षेत्र में जो भाषा बोली जाती थी,उस क्षेत्र में उसी भाषा में अपील लिखकर प्रचार प्रसार किया गया. सरकार की इस नई नीति और सरेंडर पॉलिसी के आने के बाद एक-एक करके नक्सली संगठनों में टूट शुरु हुई और धुर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों से बड़ी संख्या में नामी नक्सलियों ने अपने हथियार डाले.

बदलता अबूझमाड़, संवरता बस्तर, चमकता छत्तीसगढ़

भारत के केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह पहले ही घोषणा कर चुके हैं कि मार्च 2026 तक सशस्त्र नक्सलवाद समाप्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है. इसी लक्ष्य की दिशा में जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन पूरी प्रतिबद्धता के साथ काम कर रहे हैं. छत्तीसगढ़ सरकार की योजनाएं, सुरक्षा बलों की रणनीतिक सफलताएं और पूना मारगेम जैसे पुनर्वास कार्यक्रम मिलकर नक्सल प्रभावित इलाकों में अभूतपूर्व बदलाव ला रहे हैं.हथियार छोड़कर समाज की मुख्य धारा में लौटने का ये परिवर्तन केवल कुछ व्यक्तियों तक सीमित नहीं है.आज पूर्व नक्सली हथियार छोड़कर सिलाई मशीन संभाल रहे हैं, अपने गांवों में सम्मानपूर्वक जीवन जीने का सपना देख रहे हैं. ये परिवर्तन बताता है कि नक्सलवाद के अंधकार को विकास, पुनर्वास और विश्वास की रोशनी धीरे-धीरे पीछे धकेल रही है. कभी नक्सली दहशत के साए में सांसे लेने वाला अबूझमाड़ खुली उड़ान भर रहा है.