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राजनीतिक फंडिंग की चुनौतियाँ और पारदर्शिता की पहेली

भारत जैसे जीवंत और विशाल लोकतंत्र में, राजनीतिक दलों का वित्तपोषण केवल एक वित्तीय मामला नहीं है; यह हमारे शासन और चुनावी प्रक्रिया की आत्मा को प्रभावित करने वाला एक गहरा और बहुआयामी विषय है। इसे अक्सर फंडिंग एनग्मा कहा जाता है—एक ऐसी पहेली जहाँ भारी मात्रा में धन का प्रवाह होता है, पर उसके स्रोत और उद्देश्य एक रहस्य बने रहते हैं।

यह गुत्थी लोकतंत्र में पारदर्शिता, जवाबदेही और निष्पक्षता के केंद्रीय सिद्धांतों को लगातार चुनौती देती है। हाल के वर्षों में, राजनीतिक फंडिंग की पारदर्शिता को लेकर सबसे बड़ा सवाल चुनावी बॉन्ड योजना के इर्द-गिर्द खड़ा हुआ है। सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ने अंततः इस योजना को असंवैधानिक घोषित कर दिया, क्योंकि यह जानने के अधिकार और स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों के सिद्धांतों का उल्लंघन करती थी।

कोर्ट के आदेश के बाद सार्वजनिक हुए डेटा ने भारत के राजनीतिक फंडिंग परिदृश्य की भयावह तस्वीर पेश की। सार्वजनिक डेटा ने यह भी उजागर किया कि कैसे सत्तारूढ़ दल को बॉन्ड के माध्यम से एक बड़ा हिस्सा प्राप्त हुआ, जिससे चुनावी प्रतिस्पर्धा में एक असमान खेल का मैदान तैयार हुआ।

चुनावी बॉन्ड के जाने के बाद, अब आवश्यकता इस बात की है कि एक ऐसी नई और अधिक पारदर्शी प्रणाली लाई जाए जो न केवल चंदे के स्रोत को सार्वजनिक करे, बल्कि छोटे दानदाताओं को भी प्रोत्साहित करे। चुनावी बॉन्ड के अलावा, भारतीय राजनीति में अभी भी नकद दान और अज्ञात स्रोतों से प्राप्त धन का दबदबा कायम है।

कानून राजनीतिक दलों को 20,000 रुपये तक का नकद दान बिना किसी दाता का नाम बताए स्वीकार करने की अनुमति देता है। यह प्रावधान, जो मामूली लगता है, वास्तव में राजनीतिक दलों के लिए अज्ञात स्रोतों से बड़ी मात्रा में धन जमा करने का एक कानूनी जरिया बन गया है। चुनाव सुधारों पर काम करने वाले कई गैर-सरकारी संगठनों की रिपोर्टें लगातार दिखाती हैं कि अधिकांश राष्ट्रीय दलों की आय का एक बड़ा हिस्सा (कई मामलों में 50 प्रतिशत से अधिक) ऐसे अज्ञात स्रोतों से आता है।

इस अज्ञात धन का उपयोग अक्सर चुनावों में अनियंत्रित रूप से किया जाता है, जिससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है और धनबल का प्रभाव बढ़ता है। चुनाव आयोग और विधि आयोग जैसी संस्थाओं ने कई बार इस सीमा को 2,000 रुपये तक कम करने की सिफारिश की है, ताकि राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता लाई जा सके।

हालाँकि, राजनीतिक दलों की सर्वसम्मत इच्छाशक्ति के अभाव में यह सुधार ठंडे बस्ते में पड़ा हुआ है। राजनीतिक दलों पर आयकर रिटर्न और वार्षिक ऑडिट रिपोर्ट दाखिल करने की कानूनी बाध्यता है, लेकिन इन रिपोर्टों की जाँच की गुणवत्ता और अनुपालन का स्तर अक्सर बहुत कमजोर होता है। राजनीतिक दलों को आरटीआई के दायरे से बाहर रखना भी पारदर्शिता की कमी को बढ़ावा देता है। कॉर्पोरेट दान और सरकारी नीतिगत फैसलों के बीच सीधा संबंध अक्सर एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए खतरा पैदा करता है।

जिस कंपनी ने एक दल को भारी दान दिया है, उसे सरकारी ठेकों या नियामक छूट में अनुचित लाभ मिल सकता है, जिससे सार्वजनिक हित पीछे छूट जाता है। चुनाव प्रचार में खर्च की एक निर्धारित कानूनी सीमा है, लेकिन अधिकांश दल और उम्मीदवार बड़े पैमाने पर इस सीमा का उल्लंघन करते हैं। इस अतिरिक्त खर्च का हिसाब-किताब काला धन या अज्ञात फंडिंग के माध्यम से किया जाता है, जिससे कानून अप्रभावी हो जाता है। फंडिंग एनग्मा को सुलझाने के लिए एक बहु-आयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है।

राज्य वित्तपोषण एक ऐसी प्रणाली पर गंभीर विचार करना जहाँ सरकार राजनीतिक दलों को सीमित मात्रा में सार्वजनिक धन प्रदान करे। यह व्यवस्था निजी दान पर उनकी निर्भरता को कम करेगी, लेकिन इसे कड़े ऑडिट और दुरुपयोग रोकने के प्रावधानों के साथ लागू करने की आवश्यकता होगी। नकद सीमा में कमी: अज्ञात नकद दान की सीमा को 20,000 से घटाकर 2,000 रुपये करना एक आवश्यक पहला कदम है, जिसे तत्काल लागू किया जाना चाहिए।

पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए छोटे डिजिटल दानों पर कर छूट जैसे प्रोत्साहन दिए जाने चाहिए। सभी राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय राजनीतिक दलों को सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत लाना अनिवार्य है, जैसा कि केंद्रीय सूचना आयोग ने भी सिफारिश की है।

फंडिंग की निगरानी, ऑडिट और उल्लंघन पर दंड लगाने के लिए चुनाव आयोग को और अधिक शक्तिशाली और स्वायत्त बनाने की आवश्यकता है। जब तक राजनीतिक फंडिंग की अस्पष्टता बनी रहेगी, तब तक भारतीय लोकतंत्र की जड़ें धनबल और कॉर्पोरेट प्रभाव से कमजोर होती रहेंगी। फंडिंग एनग्मा का समाधान ही भारत में सच्ची जवाबदेही और निष्पक्ष लोकतंत्र की दिशा में पहला कदम होगा। वरना हम इंडिगो जैसा हाल आगे भी देखते और झेलते रहेंगे।