गुजरात में भाजपा की जीत का सिलसिला जारी
राष्ट्रीय खबर
अहमदाबाद: गुजरात के स्थानीय निकाय चुनावों के परिणामों ने मंगलवार को राज्य की राजनीतिक दिशा स्पष्ट कर दी। भारतीय जनता पार्टी ने शुरुआती रुझानों से ही बढ़त बनाते हुए अपना वर्चस्व कायम रखा, वहीं आम आदमी पार्टी (आप) ने कुछ क्षेत्रों में सांकेतिक जीत दर्ज कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। दूसरी ओर, कांग्रेस को अपने पारंपरिक गढ़ों में भी करारी हार का सामना करना पड़ा है, जो 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए एक गंभीर संकेत है।
28 अप्रैल को शुरू हुई मतगणना के साथ ही गुजरात का राजनीतिक पारा चढ़ गया। यह चुनाव जमीनी स्तर पर ताकत का एक बड़ा परीक्षण था, क्योंकि इसमें 15 नगर निगमों, 84 नगर पालिकाओं, 34 जिला पंचायतों और 260 तालुका पंचायतों के भाग्य का फैसला होना था। कुल 10,050 सीटों में से 732 सीटों पर निर्विरोध जीत दर्ज की गई थी, जबकि शेष सीटों पर कड़ा मुकाबला देखने को मिला।
भाजपा ने इस चुनाव में अपनी संगठनात्मक शक्ति का प्रदर्शन किया। महेसाणा नगर निगम के वार्ड नंबर 13 में भाजपा ने एक प्रेरक कहानी पेश की, जहाँ भाजपा कार्यालय कमलम में चपरासी का काम करने वाले रमेशभाई भील सहित पूरे पैनल ने जीत हासिल की। इसके अलावा, वडोदरा जिला पंचायत की पोर सीट से सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर अंकिता परमार ने 6,400 मतों के अंतर से जीत दर्ज कर डिजिटल लोकप्रियता को चुनावी सफलता में बदल दिया। राजकोट में भी भाजपा ने कांग्रेस की हाई-प्रोफाइल उम्मीदवार नयनाबा जडेजा (क्रिकेटर रवींद्र जडेजा की बहन) को वार्ड नंबर 2 में हराकर कांग्रेस के सूपड़े साफ कर दिए।
अमरेली में ऐतिहासिक शुरुआत आम आदमी पार्टी के लिए सबसे बड़ी खुशखबरी अमरेली जिले से आई, जहाँ पार्टी ने बगसरा तालुका पंचायत पर कब्जा कर लिया। गुजरात के इतिहास में यह पहली बार है जब आप ने किसी पंचायत निकाय में सत्ता हासिल की है। हालांकि, सूरत में पार्टी को झटका लगा, जहाँ वार्ड नंबर 4 जैसी पाटीदार बहुल सीटों पर भाजपा ने क्लीन स्वीप किया। आप के गुजरात प्रभारी गोपाल राय ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया कि दमन और चुनौतियों के बावजूद पार्टी ने 380 से अधिक सीटें जीती हैं और कई क्षेत्रों में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। उन्होंने भाजपा सरकार पर पुलिस और प्रशासनिक मशीनरी के दुरुपयोग का भी आरोप लगाया।
यह 2027 के गुजरात विधानसभा चुनावों के लिए आधार तैयार कर रहे हैं। भाजपा ने अपनी सर्वोच्चता साबित की है, जबकि कांग्रेस के लिए यह अस्तित्व का संकट बनता जा रहा है। जिस तरह से कांग्रेस के मजबूत माने जाने वाले किलों में सेंध लगी है, उससे साफ है कि राज्य में विपक्षी राजनीति का केंद्र बदलने की कोशिशें जारी हैं।