Breaking News in Hindi

गांधी और शास्त्री को भी याद किया मोहन भागवत ने

आरएसएस का विजयादशमी उत्सव और शताब्दी समारोह

नागपुरः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने कल नागपुर में विजयादशमी पर्व अत्यंत उत्साह के साथ मनाया। यह आयोजन इस वर्ष विशेष महत्व रखता है क्योंकि संघ अपनी स्थापना का शताब्दी वर्ष भी मना रहा है। कार्यक्रम के दौरान, आरएसएस प्रमुख सरसंघचालक मोहन भागवत ने अपना उद्बोधन दिया।

उन्होंने गुरु तेग बहादुर के बलिदान के साथ-साथ महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री के राष्ट्र के प्रति महत्वपूर्ण योगदान को श्रद्धापूर्वक याद किया।सरसंघचालक मोहन भागवत ने राष्ट्रवाद की संघ की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहा कि विविधता का पूर्ण स्वीकार और सम्मान ही वह सूत्र है जो हम सभी को एकता के बंधन में बांधता है। उन्होंने इसे ही हिंदू राष्ट्रवाद बताया। उनके अनुसार, हिंदवी, भारतीय और आर्य सभी हिंदू के समानार्थी हैं।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत में कभी भी राष्ट्र राज्य की पाश्चात्य अवधारणा नहीं रही है। उनके विचार से, हमारी संस्कृति ही हमारे राष्ट्र का निर्माण करती है। राज्यसत्ताएँ आती-जाती रही हैं, किंतु राष्ट्र चिरस्थायी रहता है, और यह हमारा सनातन हिंदू राष्ट्र है। उन्होंने कहा कि हमने उत्थान-पतन, गुलामी और स्वतंत्रता सब कुछ देखा है, और हर बार हम बचकर निकले हैं।

संघ प्रमुख के अनुसार, एक मजबूत और संगठित हिंदू समाज ही देश की सुरक्षा और अखंडता की गारंटी है। उन्होंने हिंदू समाज को एक जिम्मेदार समाज बताते हुए कहा कि यह हम और वे की मानसिकता से हमेशा मुक्त रहा है।

भागवत ने कहा कि जब भी कोई विदेशी विचारधारा भारत आई, हमने उसे अपना ही हिस्सा माना। हालाँकि, उन्होंने चिंता व्यक्त की कि देश की विविधता को वैमनस्य में बदलने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने सभी से संयम बरतने और यह सुनिश्चित करने का आग्रह किया कि हमारे शब्दों से किसी की आस्था या विश्वास का अपमान न हो।

उन्होंने स्वीकार किया कि एक बहुलवादी समाज में अराजकता और विवाद उत्पन्न हो सकते हैं, लेकिन इस बात पर बल दिया कि कानून और व्यवस्था के साथ-साथ सद्भाव का उल्लंघन नहीं होना चाहिए। उन्होंने कानून को अपने हाथ में लेने, सड़कों पर उतरकर हिंसा या गुंडागर्दी करने को अनुचित बताया। उनके अनुसार, किसी विशेष समूह को भड़काने की कोशिश करना और शक्ति प्रदर्शन करना अक्सर पूर्व नियोजित षड्यंत्र होते हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि जब सरकार जनता से कट जाती है और उनकी समस्याओं से बेखबर रहती है, तथा जनहित में नीतियाँ नहीं बनाती, तो लोग असंतुष्ट हो जाते हैं। लेकिन उन्होंने हिंसक विरोध के माध्यम से असंतोष व्यक्त करने को व्यर्थ बताया। उन्होंने तर्क दिया कि राजनीतिक क्रांतियों ने अपना लक्ष्य कभी पूरा नहीं किया है और ऐसी घटनाओं से देश-विरोधी बाहरी शक्तियों को अपने मंसूबों को पूरा करने का मौका मिल जाता है।