अफ्रीका के इथोपिया में प्राचीन जीवाश्मों की खोज
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ऑस्ट्रेलोपिथेकस प्रजाति भी मौजूद थी तब
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यही पर पत्थर के औजार भी पाये गये थे
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प्राचीन मानव की यह प्रजाति विलुप्त हुई
राष्ट्रीय खबर
रांचीः इथियोपिया में हुई एक नई खोज ने मानव विकास की हमारी समझ को पूरी तरह से बदल दिया है। वैज्ञानिकों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने अफ्रीका के लेडी-गेरारू नामक स्थान पर ऐसे जीवाश्मों की खोज की है, जो बताते हैं कि ऑस्ट्रेलोपिथेकस और हमारे अपने वंश, होमो की सबसे पुरानी प्रजातियाँ, एक ही समय पर (लगभग 2.6 से 2.8 मिलियन वर्ष पहले) एक ही जगह पर मौजूद थीं। इस खोज में ऑस्ट्रेलोपिथेकस की एक नई प्रजाति के दांत मिले हैं, जो पहले कभी नहीं पाई गई थी।
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यह शोध लेडी-गेरारू रिसर्च प्रोजेक्ट के तहत एरिजोना स्टेट यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया है। यह वही जगह है जहाँ सबसे पुराने होमो वंश के जीवाश्म और ओल्डोवान पत्थर के औजार पाए गए थे। इस नई खोज से यह बात भी पुष्ट हुई है कि ‘लुसी’ के नाम से मशहूर ऑस्ट्रेलोपिथेकस अफ़ारेन्सिस की प्रजाति 2.95 मिलियन वर्ष पहले के बाद मौजूद नहीं थी।
एरिज़ोना स्टेट यूनिवर्सिटी की पेलियोइकोलॉजिस्ट, काये रीड के अनुसार, यह खोज दर्शाती है कि मानव विकास एक सीधी रेखा में नहीं हुआ है। हमारा विकास एक झाड़ीदार पेड़ की तरह है, जहाँ कई शाखाएँ निकलीं और कुछ समय बाद विलुप्त हो गईं। यह नई खोज इस बात का प्रमाण है कि शुरुआती मानव प्रजातियाँ एक साथ रहती थीं, संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा करती थीं या उन्हें साझा करती थीं।
इस महत्वपूर्ण कहानी को बताने वाले जीवाश्म दांत हैं—कुल मिलाकर 13 दांत। 2013 में, इसी टीम को 2.8 मिलियन वर्ष पुराना, सबसे शुरुआती होमो प्रजाति का जबड़ा मिला था। अब मिले ये नए दांत होमो और ऑस्ट्रेलोपिथेकस की एक अज्ञात नई प्रजाति दोनों के हैं। हालांकि, सिर्फ दांतों के आधार पर वैज्ञानिक अभी तक इस नई प्रजाति का नाम नहीं रख पाए हैं; इसके लिए और जीवाश्मों की आवश्यकता है।
वैज्ञानिक इन लाखों साल पुराने जीवाश्मों की उम्र ज्वालामुखी की राख से पता लगाते हैं। इथियोपिया का अफ़ार क्षेत्र आज भी एक सक्रिय विवर्तनिक क्षेत्र है। लाखों साल पहले यहाँ कई ज्वालामुखी थे। इन ज्वालामुखियों से निकली राख में फेल्डस्पार नामक क्रिस्टल होते हैं, जिनकी मदद से वैज्ञानिक राख की उम्र का पता लगा सकते हैं।
एएसयू के भूवैज्ञानिक क्रिस्टोफर कैम्पिसानो के अनुसार, ये जीवाश्म उन ज्वालामुखी विस्फोटों की परतों के बीच दबे हुए थे। इन परतों की उम्र पता करके वैज्ञानिक यह अनुमान लगा सकते हैं कि जीवाश्म कितने पुराने हैं। इस तरह, भूविज्ञान हमें न केवल जीवाश्मों की उम्र बताता है, बल्कि उस समय के पर्यावरण को समझने में भी मदद करता है।
अब शोधकर्ता इन दांतों के एनामेल का अध्ययन कर रहे हैं ताकि यह पता लगाया जा सके कि ये दोनों प्रजातियाँ क्या खाती थीं। क्या वे एक ही तरह के भोजन के लिए प्रतिस्पर्धा करती थीं? क्या वे एक-दूसरे से रोज़ मिलते थे? इन प्रजातियों के पूर्वज कौन थे? इन सभी सवालों के जवाब अभी बाकी हैं।
काये रीड के अनुसार, इन सवालों का जवाब देने के लिए और अधिक जीवाश्मों की खोज आवश्यक है। यह नई खोज यह बताती है कि मानव विकास की कहानी अभी भी अधूरी है और आगे की खोजें हमें हमारे पूर्वजों के बारे में और भी महत्वपूर्ण बातें बता सकती हैं, क्योंकि आखिर हम ही वे हैं जो इस विकास यात्रा में बच पाए।