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अब अवमानना की कार्यवाही प्रारंभ करूंगीः जस्टिज स्वर्णकांता शर्मा

आबकारी नीति मामला की सुनवाई में सोशल मीडिया से परेशानी

  • निचली अदालत पर अब तक चर्चा नहीं

  • सोशल मीडिया में जबर्दस्त आलोचना हुई

  • उनसे मामले से अलग होने का कहा गया था

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने गुरुवार को कहा कि वह आबकारी नीति मामले के कुछ आरोपियों के साथ-साथ कुछ अन्य व्यक्तियों के खिलाफ अदालत की अवमानना की कार्यवाही शुरू करेंगी। यह निर्णय सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ मानहानिकारक और अपमानजनक आरोप लगाने के विरोध में लिया गया है।

न्यायमूर्ति शर्मा ने इस संबंध में विस्तृत विवरण का खुलासा तो नहीं किया, लेकिन कहा कि वह आज शाम 5 बजे इस पर एक विस्तृत आदेश पारित करेंगी। न्यायमूर्ति शर्मा वर्तमान में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो द्वारा दायर उस याचिका पर सुनवाई कर रही हैं, जिसमें ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई है जिसके तहत अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और अन्य सहित सभी 23 आरोपियों को आबकारी नीति मामले में आरोपमुक्त कर दिया गया था।

इससे पहले अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और दुर्गेश पाठक ने न्यायमूर्ति शर्मा से इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग करने की मांग की थी। हालांकि, न्यायमूर्ति शर्मा ने 20 अप्रैल को उनके आवेदन को खारिज कर दिया था। उस आदेश में न्यायाधीश ने कहा था कि किसी राजनेता को अविश्वास के बीज बोने की अनुमति नहीं दी जा सकती और उनकी सुनवाई से हटने की मांग वाला आवेदन न्यायपालिका को कटघरे में खड़ा करने के समान है।

यह मामला 2022 में शुरू हुआ था जब सीबीआई ने एक प्राथमिकी दर्ज की थी। इसमें आरोप लगाया गया था कि दिल्ली आबकारी नीति 2021-22 में शराब व्यापार के एकाधिकार और कार्टेलाइजेशन की सुविधा के लिए हेरफेर किया गया था। जांच एजेंसी का दावा है कि नीति में बदलाव के बदले आप नेताओं को शराब निर्माताओं से रिश्वत मिली थी। बाद में प्रवर्तन निदेशालय ने भी इस मामले में धन शोधन निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया।

इस जांच के बाद विपक्षी नेताओं की सिलसिलेवार गिरफ्तारियां हुईं, जिसे कुछ हलकों में राजनीतिक रूप से प्रेरित बताकर आलोचना की गई। आरोप था कि सिसोदिया और केजरीवाल सहित आप नेताओं ने नीति निर्धारण के चरण में ही आपराधिक साजिश रची थी और जानबूझकर इसमें ऐसी कमियां छोड़ी थीं जिससे चुनिंदा लाइसेंसधारियों को फायदा पहुँचाया जा सके।

इसी वर्ष 27 फरवरी को एक ट्रायल कोर्ट ने केजरीवाल और 22 अन्य को बरी कर दिया था। सीबीआई की चुनौती के बाद न्यायमूर्ति शर्मा ने 9 मार्च को ट्रायल कोर्ट के आदेश पर रोक लगाते हुए प्रथम दृष्टया पाया कि निचली अदालत की कुछ टिप्पणियां त्रुटिपूर्ण थीं। इसके बाद ही आरोपियों ने न्यायमूर्ति से हटने का अनुरोध किया था, जिसे खारिज किए जाने के बाद केजरीवाल, सिसोदिया और पाठक ने न्यायमूर्ति शर्मा के समक्ष कार्यवाही का बहिष्कार करने का निर्णय लिया।