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भाजपा के रास्ते पर ही चलने लगी है झारखंड कांग्रेस

मंत्रियों और संगठन के बीच का अंतर साफ

  • डॉ ऊरांव के बाद से परिपाटी खत्म

  • नेताओं के घरों पर लग रहा है दरबार

  • पार्टी के कार्यक्रमों में भी कमी आ गयी है

राष्ट्रीय खबर

रांचीः रघुवर दास  के शासन काल में भाजपा ने जो गलतियां की थी, वह अब झारखंड कांग्रेस की आदत बन गयी है। दरअसल चुनाव जीतकर मंत्री बनने वाले विधायकों ने प्रदेश संगठन अथवा कार्यालय से लगभग अपना रिश्ता खत्म कर लिया है। इन तमाम मंत्रियों को प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में शायद ही कभी देखा जा सकता है।

दूसरी तरफ संगठन के तमाम नेता भी मंत्रियों के दरबार में जाने से परहेज करते हैं। इस वजह से पार्टी के मंत्रियों और संगठन के बीच का फासला धीरे धीरे बढ़ता जा रहा है। मजेदार बात यह है कि भाजपा के शासन काल में जो बिचौलिये भाजपा के मंत्रियों के आवास के आस पास मंडराते थे, उनमें से कई चेहरे अब कांग्रेस कोटा से मंत्री बने लोगों के यहां दिखने लगे हैं।

झारखंड कांग्रेस के ताजा इतिहास पर गौर करें तो डॉ रामेश्वर ऊरांव के मंत्री के साथ साथ प्रदेश अध्यक्ष होने तक कांग्रेस के मंत्रियों और विधायकों का प्रदेश कांग्रेस कार्यालय आना जाना नियमित हुआ करता था। डॉ ऊरांव के बदले राजेश ठाकुर को जब यह कुर्सी सौंपी गयी तो अनेक लोगों ने कार्यालय से दूरी बना ली। इनमें से कई विधायक काफी जूनियर नेता को यह जिम्मेदारी सौंपे जाने से खुश नहीं थे। इसलिए ऐसे लोगों ने प्रदेश कार्यालय में नियमित आना जाना बंद कर दिया।

अब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की जिम्मेदारी अनुभवी नेता केशव महतो कमलेश को सौंपी गयी है। इसके बाद भी कांग्रेस कोटा से मंत्री बने लोगों को बहुत कम अवसरों पर प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में देखा जा रहा है। इसकी वजह स्पष्ट नहीं होने के बाद भी इतना साफ है विधायक और मंत्रियों का समानांतर संगठन चल रहा है जो कभी रघुवर दास के शासन काल में भाजपा के पतन का मूल कारण बना था। संगठन और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के बीच की दूरी ही भाजपा के पराजित होने में मूल कारण थी। अब कांग्रेस के नेता भी वही गलती लगातार दोहरा रहे हैं।

कांग्रेस के नेता इस बारे में खुलकर बात नहीं करते लेकिन विधायकों और मंत्रियों के आवास पर लगने वाली भीड़ से यह अंदाजा हो जाता है कि आम जनता तक यह संदेश पहुंच चुका है कि पार्टी कार्यालय में जाना अब ऐसे निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की प्राथमिक जिम्मेदारी की सूची से बाहर हो चुका है। यूं तो इस बार कांग्रेस को भी बेहतर चुनावी सफलता मिली है पर संगठन को भविष्य के लिए और अधिक मजबूत करने की दिशा में अब तक कोई पहल नहीं हुई है। चुनाव के बाद पार्टी के कार्यक्रम भी सीमित हो गये हैं और सिर्फ हेमंत सोरेन द्वारा आयोजित सरकारी कार्यक्रमों में पार्टी और मंत्री एक साथ नजर आते हैं।