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दुनिया की ओजोन परत की रिकवरी में बाधा, देखें वीडियो

एमआईटी के वैज्ञानिकों ने खोजी छिपी हुई एक समस्या

  • फीडस्टॉक रसायनों का बढ़ता रिसाव

  • ओजोन पर्त को ठीक होने से रोक रही

  • अनुमान से अधिक हो रहा है रिसाव

राष्ट्रीय खबर

रांचीः मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी अनपेक्षित समस्या का पता लगाया है जो ओजोन परत के सुधार की गति को धीमा कर रही है। 1987 का मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल दुनिया की सबसे सफल पर्यावरणीय संधि मानी जाती है, जिसने ओजोन को नुकसान पहुँचाने वाले रसायनों को वैश्विक स्तर पर चरणबद्ध तरीके से समाप्त किया। हालांकि, इस समझौते में एक छूट दी गई थी, जो अब ओजोन परत के लिए खतरा बन रही है।

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संधि के तहत कुछ रसायनों को फीडस्टॉक के रूप में उपयोग करने की अनुमति दी गई थी। माना जाता था कि अन्य रसायनों के निर्माण में उपयोग होने वाले ये पदार्थ वातावरण में केवल 0.5 फीसद ही रिसते हैं। लेकिन हालिया शोध ने इस धारणा को चुनौती दी है। एमआईटी और अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं की टीम ने पाया है कि यह रिसाव अनुमान से कहीं अधिक है, जो ओजोन परत की रिकवरी को लगभग 7 साल तक पीछे धकेल सकता है।

अध्ययन की लेखिका और एमआईटी की प्रोफेसर सुसान सोलोमन का कहना है कि दुनिया भर में ओजोन क्षयकारी पदार्थों का उत्पादन लगभग बंद हो चुका है, लेकिन फीडस्टॉक का उपयोग एक खामी की तरह बना हुआ है। ये रसायन प्लास्टिक और नॉन-स्टिक कोटिंग्स बनाने में धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहे हैं।

वैज्ञानिकों के वैश्विक निगरानी नेटवर्क ने पाया कि फीडस्टॉक रिसाव की दर 0.5 प्रतिशत के बजाय 3.6 प्रतिशत के करीब है। यदि इस रिसाव को नहीं रोका गया, तो जो ओजोन परत 2066 तक ठीक होने वाली थी, वह अब 2073 तक ही अपने पुराने स्वरूप (1980 के स्तर) में लौट पाएगी। 1985 में अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन छिद्र की खोज के बाद से ही क्लोरोफ्लोरोकार्बन पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए थे। लेकिन औद्योगिक मांग बढ़ने के कारण फीडस्टॉक उत्सर्जन अब एक बड़ी चुनौती बन गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि समाधान संभव है। उद्योग जगत वैकल्पिक रसायनों का उपयोग कर सकता है या औद्योगिक प्रक्रियाओं को सख्त बनाकर रिसाव को कम कर सकता है। स्विट्जरलैंड के शोधकर्ता स्टीफन रीमैन के अनुसार, हमें चेतावनी की घंटी बजानी होगी। ओजोन रिकवरी में सात साल की देरी का मतलब है—त्वचा कैंसर के हजारों अतिरिक्त मामले।

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