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सत्यपाल मलिक पहले भी गिरा चुके हैं एक सरकार

सत्यपाल मलिक के खुलासे के बाद भाजपा खेमा में लगभग चुप्पी है। सिर्फ केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने इस पर अपनी राय दी है। दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुप है। वह अडाणी मुद्दे पर भी कुछ नहीं बोल रहे हैं। इसके बीच राहुल गांधी अपनी सदस्यता गंवाने और सरकारी बंगला खाली करने के बाद यह कह चुके हैं कि वह सच बोलने की कीमत चुका रहे हैं और वह इसके लिए तैयार हैं।

इस तरह माहौल बदल रहा है। इसके बीच ही सत्यपाल मलिक को सीबीआई द्वारा बुलाने तथा आरके पुरम थाना में उनके जाने के बाद कई पुरानी यादों को राजनीति के जानकारों ने ताजा कर दिया है। यह बता देना प्रासंगिक है कि सत्यपाल मलिक पहले भी इस तरीके से सरकार के टकरा चुके हैं।

बोफोर्स तोप सौदा मामले में वह पूर्व प्रधानमंत्री बीपी सिंह के साथ थे। घटनाक्रम कुछ ऐसा था कि इंदिरा गांधी की मौत के तुरंत बाद हुए चुनाव में राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने 404 सीटें जीती थी। बोफोर्स तोप सौदे में दलाली और भ्रष्टाचार से खफा होकर वीपी सिंह ने अप्रैल 1987 में न केवल केंद्र सरकार से इस्तीफा दे दिया था बल्कि राजीव गांधी की सरकार को उखाड़ फेंकने का जिम्मा भी उठा लिया था।

कांग्रेस और केंद्र सरकार से इस्तीफा देने के बाद वीपी सिंह ने तब अरुण नेहरू और आरिफ मोहम्मद खान के साथ मिलकर जन मोर्चा बनाया था। इसी बैनर के तहत वह देशभर में राजीव गांधी सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ जनसभाएं कर रहे थे। 1988 के शुरुआती दिनों में सर्दी के मौसम में वीपी सिंह अपने साथियों के साथ पश्चिमी यूपी के बड़ौत में जन मोर्चा की पहली बड़ी जनसभा करने पहुंचे थे।

उस वक्त 40 वर्षीय सत्यपाल मलिक ने जाट लैंड पर वीपी सिंह की अगुवानी की थी। भीड़ हजार से ज्यादा नहीं रही होगी फिर भी मंच पर सत्यपाल मलिक को अरुण नेहरू और रामधन के साथ बैठाया गया था। यह इस बात की तस्दीक थी कि जाट लैंड समेत अन्य हिस्सों में सत्यपाल मलिक की जिम्मेदारी और ओहदा बढ़ने वाला है। 1989 के अगस्त आते-आते वीपी सिंह ने देश में राजीव गांधी और कांग्रेस के खिलाफ हवा बना दी थी।

अगस्त 1989 में विपक्षी दलों के सभी सांसदों ने लोकसभा से इस्तीफा दे दिया था। राज्यसभा से इस्तीफा देने वालों में सत्य पाल मलिक तब इकलौते सांसद थे। वह तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार में हुए भ्रष्टाचार के मुद्दे पर वीपी सिंह के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहे थे।

1989 के चुनाव में जनता दल ने उन्हें अलीगढ़ से उतारा था। अलीगढ़ से चुनाव जीतने के बाद वीपी सिंह की सरकार में मलिक को संसदीय कार्य और पर्यटन राज्यमंत्री बनाया गया था। 1946 में मेरठ में जन्मे सत्य पाल मलिक शुरुआती वर्षों में सोशलिस्ट पार्टी की युवा शाखा समाजवादी युवजन सभा के सदस्य रह चुके थे। उन्होंने स्वतंत्रता सेनानी कैप्टन अब्बास अली से सियासी ट्रेनिंग ली थी। छात्र-जीवन में ही फायरब्रांड नेता के रूप में अपनी पहचान बनाने वाले मलिक समाजवादी नेता राज नारायण और राम मनोहर लोहिया से खासे प्रभावित रहे हैं।

1970 तक आते-आते वह देश के सबसे बड़े किसान नेता चौधरी चरण सिंह के खास लोगों में शुमार हो चुके थे। सत्य पाल मलिक चरण सिंह की पार्टी लोक दल के महासचिव भी रह चुके हैं। कहा जाता है कि मोरारजी देसाई की सरकार गिरने के बाद चौधरी चरण सिंह की सरकार बनवाने में मलिक ने इंदिरा गांधी के साथ वार्ता में अहम भूमिका निभाई थी। 1980 में जब केंद्र में कांग्रेस की सरकार वापस आई तो मलिक को राज्यसभा में भेजा गया था।

1986 में उन्हें दोबारा राज्यसभा भेजा गया था लेकिन 1989 में उन्होंने वीपी सिंह का साथ देने के लिए कांग्रेस और राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया था। इसलिए मीडिया का एक वर्ग उनपर जो सत्ता का लोभी होने का आरोप मढ़ना चाहता है, वह पूर्व रिकार्ड की वजह से खास तौर पर जाटलैंड में स्वीकार्य नहीं होगा।

इसलिए जो दांव दूसरे दलों के नेताओं पर चल जाता है, वही दांव सत्यपाल मलिक पर भी चलेगा, इसकी संभावना नहीं है। इसके पहले ही अडाणी कांड की वजह से भाजपा के अंदर भी एक संशय का वातावरण बनता दिख रहा है। दूसरे मुद्दों पर तुरंत बोलने वाले नेता इस मुद्दे पर चुप्पी क्यों साध लेते हैं, यह जनता का सवाल बन चुका है।

ऐसी स्थिति में सत्यपाल मलिक ने जम्मू कश्मीर में राज्यपाल रहते हुए जिन दो प्रमुख मुद्दों की चर्चा कर दी है, वे हल्के में समाप्त होने वाले नहीं है। पुलवामा के आतंकी हमले के वक्त सुरक्षा बलों को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने हवाई जहाज क्यों नहीं दिया तथा सरकारी कर्मचारियों के बीमा के लिए किसी निजी कंपनी को फायदा पहुंचाने की सिफारिश से माहौल बदला है। इसलिए तय है कि पुराने दांव शायद इस जाट और किसान नेता पर काम नहीं करेंगे।