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राहुल की सजा नफा या नुकसान

शायद राजनेता इतिहास के घटनाक्रमों से सबक नहीं लेते हैं। उन्हें याद दिलाना जरूरी है कि दिल्ली में बाबा रामदेव के आंदोलन में सब कुछ ठीक चल रहा था। जनता भी उत्तेजित नहीं थी। रात को अचानक वहां हुए लाठी चार्ज के बाद माहौल बदल गया। उसके बाद अन्ना हजारे का आंदोलन हुआ तब भी कांग्रेस की सरकार ने वही गलती दोहरायी और जबरन आंदोलन को दबाने के लिए ताकत का इस्तेमाल कर जनता को ही अपने खिलाफ कर लिया क्योंकि तब तक इतने सारे घोटालों के आरोप पर कांग्रेस सही तरीके से जबाव भी नहीं दे पा रही थी। उसका नतीजा क्या हुआ है, यह सभी के सामने है।

अब लगता है कि भाजपा भी कांग्रेस की उन्हीं गलतियों को दोहरा रही है। अडाणी विवाद में घिरी सरकार कुछ ना बोले लेकिन अंदरखाने में जनता के बीच क्या संदेश गया है, इसे समझने के लिए रॉकेट साइंस का ज्ञान होना जरूरी नहीं है। सूरत के मजिस्ट्रेट एच एच वर्मा की अदालत ने राहुल गांधी को दो साल की सजा सुनाने के साथ साथ जमानत भी दे दी और उनकी सजा पर 30 दिन की रोक लगा दी, ताकि कांग्रेस नेता उसके फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती दे सकें।

अदालत ने कांग्रेस नेता को भारतीय दंड संहिता की धाराओं 499 और 500 के तहत दोषी करार दिया। अब सवाल ये उठ रहे हैं कि क्या दो साल जेल की सजा होने पर राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता रद्द होगी या नहीं। दरअसल यही मुद्दा भाजपा के लिए अच्छा संकेत नहीं है। आम तौर पर भारतीय जनमानस की राजनीतिक सोच इस किस्म के आचरणों का समर्थन नहीं करती। यह गौर करने लायक बात है कि सजा सुनाने में कोर्ट का कहना था कि सांसदों के बयानों का जनता पर बहुत व्यापक प्रभाव पड़ता है। इससे उनका अपराध और गंभीर हो जाता है।

अब मानहानि के कानूनी पहलु को भी समझ लें। मानहानि के अंदर आने वाली बाते जानने के साथ ये जानना भी जरूरी है कि किन बातों को मानहानी नहीं माना जाता। किसे व्यक्ति के लिए की गयी सच्ची टिप्पणी मानहानि के अन्दर नहीं आती है। उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति के बारे में अगर सच्ची टिप्पणी की गयी हो तो उसे मानहानि नहीं माना जाता। इसमे भी यदि ऐसी टिप्पणी सार्वजनिक हित में की गयी हो तो मानहानी नहीं कहलाती।

इसके अलावा यदि कोइ व्यक्ति किसी भी प्रसिद्ध या पब्लिक फिगर के सार्वजनिक आचरण के बारे में टिपणी करें जो सार्वजनिक हित में हो, लोगों की भलाई के लिए हो, उन्हें सचेत करने के लिए हो तो इसे मानहानि नहीं माना जाता है। कोई भी ऐसा व्यक्ति जिसकी प्रतिष्ठा यानी के मान की हानि हुई हो वो भारतीय आईपीसी की धारा 499 अथवा 500 के अंतर्गत मानहानि करने वाले व्यक्ति पर आपराधिक मुकदमा दायर कर सकता है।

कानून में मानहानि की परिभाषा बताई गयी है। इसके अनुसार यदि कोई व्यक्ति ऐसा अपराध करेगा तो उसे दो साल के कारावास व जुर्माने या दोनो की सजा भुगतनी होगी। झूठे मुकदमे से बचाव इस क़ानून का दुरुपयोग ना हो इसके लिए भी प्रावधान है। अगर कोई व्यक्ति ईर्ष्या या द्वेष की भावना से या किसी को ब्लेकमेल करने के इरादे से मानहानी का झूठा केस करता है तो ऐसे व्यक्ति के खिलाफ ही मुकदमा किया जा सकता है।

इस तरह स्पष्ट है कि भाजपा के नेता द्वारा दायर किया गया मुकदमा तो भाजपा को फायदा पहुंचाने के लिए ही किया गया है। राजनीतिक विश्लेषण भी सामने आ चुका है कि दरअसल भाजपा की सोच राहुल को चुनाव लड़ने से रोकने की है। लेकिन भाजपा इस बात को समझ नहीं पा रही है कि भारत जोड़ो यात्रा के बाद राहुल गांधी का राजनीतिक कद बहुत बढ़ गया है और ऐसे मामलों से उन्हें नुकसान कम और लाभ ज्यादा होने जा रहा है।

आम जनता पहले से ही अडाणी मामले में सरकार की चुप्पी से नाराज है। यह भी दरअसल भाजपा की अपनी चाल है, जिसमें वह अब खुद फंस रही है। कांग्रेस ने भी अपने ऊपर लगे आरोपों का उत्तर नहीं देकर जनता के मन में यह संदेह पैदा कर दिया था कि दाल में कुछ काला है। अब वही स्थिति भाजपा की है।

इसके अलावा ईडी और सीबीआई के दुरुपयोग का आरोप भी दमदार है क्योंकि दूसरे दलों से भाजपा में शामिल होने वाले अनेक नेताओं पर लगे आरोपों को यूं ही खारिज नहीं किया जा सकता। इसमें जिस बात का उल्लेख बिल्कुल नहीं हुआ है वह बिहार का सृजन घोटाला है। अब राहुल गांधी के सजा के एलान से भाजपा को राजनीतिक लाभ होना या नुकसान यह भाजपा के लिए समझने वाली बात है। कुल मिलाकर इस मामले के फैसले का समय शायद भाजपा के लिए राजनीतिक तौर पर अनुकूल नहीं रहा है क्योंकि अभी वह खुद जनता के सवालों के घेरे में है।