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चॉकलेट इतनी अच्छी क्यों लगती है पर शोध

  • घुलते ही प्रतिक्रिया तेज होती है

  • थ्री डी मॉडल बनाकर समझा गया

  • भविष्य में और बेहतर चॉकलेट की तैयारी

राष्ट्रीय खबर

रांचीः चॉकलेट अधिकांश को पसंद होता है। खास कर बच्चों को बहलाने के लिए यह एक आसान तरीका है। उम्र बढ़ने अथवा दांत अथवा सुगर की समस्या होने की वजह से अनेक लोग इसका सेवन नहीं करते। फिर भी चॉकलेट नजर आते ही इंसानी जीभ में उसके स्वाद का एहसास पहुंचते ही एक रस पैदा हो जाता है।

सामान्य भाषा में इसे इंसानी लार कहा जाता है। इस लार की भूमिका किसी भी भोजन को पचाने में महत्वपूर्ण होती है। पहली बार शोधकर्ताओं ने चॉकलेट खाने के बाद जीभ के अंदर होने वाली हर प्रतिक्रिया को दर्ज करने में सफलता पायी है। ठोस चॉकलेट का मुंह में रखते ही घुलना और एक आनंद देने वाले स्वाद के साथ खाने वालों को बहलाना, इसकी प्रमुख भूमिका है।

शायद इसी वजह से बच्चों को आज भी बहलाने फुसलाने में चॉकलेट का इस्तेमाल धड़ल्ले से होता है। लेकिन शोधकर्ताओं के इसके असली कारण का पता लगाया है और इस क्रम में पाया गया है कि जो लोग इसे नहीं खा पाते हैं, उनकी जीभ में भी इसे देख लार बनने की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है।

अनुसंधान में यह पाया गया है कि चॉकलेट में ही कई ऐसे पदार्थ होते हैं, जो जीभ में जाते ही घुलने लगते हैं। इसके स्वाद का स्पर्श जीभ के तंतुओं तक पहुंचते ही लार के बनने की प्रक्रिया तेज हो जाती है और चॉकलेट और तेजी से मुंह के अंदर घुलने लगता है। यूनिवर्सिटी ऑफ लीड्स के शोध दल ने पाया है कि जीभ पर जाते ही चॉकलेट का बसा सबसे पहले घुलता है और वह अपने आस पास के अन्य पदार्थों को भी घुलने पर मजबूर कर देता है।

इसकी वजह से मुंह के अंदर तरल पदार्थ का स्वाद पाकर जीभ लार बनाने की गति को तेज कर देता है। दोनों के मिश्रण से चॉकलेट के घुलने की प्रक्रिया और तेज हो जाती है। जीभ के अंदर के ऐसे तंतुओँ की भी पहचान की गयी जो स्वाद के अनुसार आचरण कर सकते हैं। इस शोध से जुड़ी भारतवंशी वैज्ञानिक प्रोफसर अन्वेषा सरकार ने कहा कि इस एक शोध से अब भविष्य में भोजन कैसा हो अथवा उसका बेहतर स्वाद कैसा हो, उसे तैयार करने में बड़ी मदद मिल पायेगी।

इसके साथ ही हर चॉकलेट में कोकोआ का हिस्सा होने की वजह से वह स्वाद को और पसंदीदा बनाता है। परीक्षण में अलग अलग किस्म के चॉकलेटों को शामिल किया गया था। इस परीक्षण में अलग अलग आयु वर्ग के स्वयंसेवक भी शामिल किये गये थे। इस परीक्षण के आधार पर मिले आंकड़ों के आधार पर एक कृत्रिम थ्री डी जीभ बनाकर उस पर भी इसका परीक्षण किया गया।

थ्री डी मॉडल को देखकर पता चला कि दरअसल जीभ के अंदर होता क्या है। इसके लिए ट्राईबोलॉजी का इस्तेमाल किया गया। यह वह विज्ञान है, जिसके आधार पर किसी भी सतह पर तरल की प्रतिक्रिया को देखा जाता है। यह देखा गया कि जीभ के ऊपर चॉकलेट रखते ही उसकी एक बसा वाली परत घुल गयी।

इस तरलता से जीभ के अंदर से तमाम स्पर्शेंद्रियां सक्रिय हुई और वहां तेजी से तरल बनता चला गया। जैसे जैसे तरलता की मात्रा बढ़ी, चॉकलेट के घुलने की गति भी तेज होती चली गयी। शोध दल यह उम्मी करता है कि इस शोध के आधार पर भविष्य में और बेहतर किस्म का चॉकलेट बनाना संभव होगा और साथ ही इंसानो के लिए बेहतर स्वाद के पुष्टिबर्धक भोजन की दिशा में शोध की गाड़ी आगे बढ़ेगी। हो सकता है कि इसी शोध के आधार पर शीघ्र ही बाजार में और उन्नत किस्म का चॉकलेट भी आ जाए। जो खाने वाले के लिए और पुष्टि प्रदान करने वाला हो।