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पड़ोस में नई सरकार भारत की चुनौती बढ़ी

पड़ोसी देश नेपाल में गठबंधन की सरकार बनने जा रही है। इसके तहत पुष्प कमल दहल यानी पहले के माओवादी नेता प्रचंड अब सरकार में प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं। एक हथियारबंद विद्रोह का नेतृत्व करने वाले नेता का प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचना भारत के लिए कठिन चुनौती है। यूं तो प्रचंड राजनीतिक जीवन में आने के बाद भूमिगत नहीं हैं और भारत आ चुके हैं।

फिर भी इस बात को समझना होगा कि माओवादी विचारधारा से प्रभावित व्यक्ति सैद्धांतिक तौर पर चीन के करीब होगा। यह अलग बात है कि अब चीन में भी माओवाद महज दिखावे की  बात होकर रह गयी है और वहां कुल मिलाकर एक तानाशाही शासन व्यवस्था कायम हो चुकी है।

इस कारण भारत को अपने इस पड़ोसी के साथ बेहतर कूटनीतिक संबंध बनाने के लिए नये सिरे से काम करना होगा। यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि भारत के कई राज्यों की सीमा नेपाल से लगती है और सीमावर्ती इलाकों में लोगों के बीच रोटी-बेटी का रिश्ता भी कायम है।

रविवार को घटनाओं के एक नाटकीय मोड़ में विपक्षी सीपीएन-यूएमएल और अन्य छोटे दलों ने सीपीएन-माओवादी सेंटर के अध्यक्ष पुष्प कमल दहल को अपना समर्थन दिया है, जो तीसरी बार नेपाल के प्रधानमंत्री बने हैं। पूर्व प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली के नेतृत्व वाले विपक्षी सीपीएन-यूएमएल, सीपीएन-माओवादी सेंटर, राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) और अन्य छोटे दलों की एक महत्वपूर्ण बैठक में ‘प्रचंड’ के नेतृत्व में सरकार बनाने पर सहमति बनी।

सीपीएन-एमसी देब के महासचिव गुरुंग ने कहा कि सीपीएन-यूएमएल, सीपीएन-एमसी और अन्य पार्टियां संविधान के अनुच्छेद 76 (2) के तहत 165 सांसदों के हस्ताक्षर के साथ राष्ट्रपति कार्यालय ‘शीतलनिवास’ में प्रचंड को प्रधानमंत्री बनाने का दावा करने के लिए तैयार हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति को सौंपने के लिए एक समझौता पत्र तैयार किया जा रहा है।

इस नए गठबंधन को 275 सदस्यीय प्रतिनिधि सभा में 165 सांसदों का समर्थन प्राप्त है, जिसमें सीपीएन-यूएमएल को 78, सीपीएन-एमसी को 32, आरएसपी को 20, आरपीपी को 14, जेएसपी को 12, जनमत को 6 और नागरिक उन्मुक्ति पार्टी को 3 वोट मिले हैं। सीपीएन-यूएमएल के महासचिव शंकर पोखरेल ने बैठक के बाद संवाददाताओं से कहा कि सबसे बड़ी पार्टी के रूप में नेपाली कांग्रेस राष्ट्रपति की समय सीमा के भीतर संविधान के अनुच्छेद 76 (2) के अनुसार अपने नेतृत्व में सरकार बनाने में विफल रही। अब सीपीएन-यूएमएल ने 165 सांसदों के समर्थन से प्रचंड के नेतृत्व में नई सरकार बनाने की पहल की है।

इस बैठक में ओली के आवास बालकोट में ओली, प्रचंड, आरएसपी अध्यक्ष रवि लामिछाने, राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी के प्रमुख राजेंद्र लिंगडेन, जनता समन्वयवादी पार्टी के अध्यक्ष अशोक राय सहित अन्य लोगों ने भाग लिया। रोटेशन के आधार पर सरकार का नेतृत्व करने के लिए प्रचंड और ओली के बीच समझौता हुआ।

ओली अपनी मांग के अनुसार, प्रचंड को पहले प्रधानमंत्री बनाने पर सहमत हुए। इससे पहले दिन में, प्रधानमंत्री और नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा द्वारा अपनी मांग न माने पर प्रचंड नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व वाले पांच दलों के गठबंधन से बाहर चले गए। देउबा और प्रचंड पहले बारी-बारी से नई सरकार का नेतृत्व करने के लिए मौन सहमति पर पहुंचे थे।

रविवार सुबह पीएम हाउस में प्रचंड के साथ बातचीत के दौरान नेपाली कांग्रेस ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री दोनों प्रमुख पदों के लिए दावा किया था, जिसे प्रचंड ने खारिज कर दिया था, जिसके परिणामस्वरूप वार्ता विफल हो गई थी। नेपाली कांग्रेस ने माओवादी पार्टी को अध्यक्ष पद की पेशकश की, जिसे प्रचंड ने खारिज कर दिया।

प्रधानमंत्री देउबा के साथ वार्ता विफल होने के बाद, प्रचंड प्रधान मंत्री बनने के लिए समर्थन मांगने के लिए सीपीएन-यूएमएल अध्यक्ष ओली के निजी आवास पर पहुंचे। उनके साथ अन्य छोटे दलों के नेता भी शामिल हुए। प्रतिनिधि सभा में 89 सीटों के साथ नेपाली कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी है, जबकि सीपीएन-यूएमएल और सीपीएन-एमसी के पास क्रमश: 78 और 32 सीटें हैं। 275 सदस्यीय प्रतिनिधि सभा में किसी भी दल के पास सरकार बनाने के लिए आवश्यक 138 सीटें नहीं हैं।

संविधान के अनुच्छेद 76(2) के तहत गठबंधन सरकार बनाने के लिए राजनीतिक दलों को राष्ट्रपति बिद्या भंडारी द्वारा दी गई समय सीमा रविवार शाम को समाप्त हो रही है। यदि पार्टियां समय सीमा को पूरा करने में विफल रहती हैं, तो राष्ट्रपति या तो समय सीमा बढ़ा देंगे यदि राजनीतिक दल अनुरोध करते हैं या वह संविधान के अनुच्छेद 76 (3) के तहत सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने के लिए बुलाएंगे। ऐसे में प्रधानमंत्री को 30 दिनों के भीतर एचओआर में बहुमत साबित करना चाहिए। अब भारत को नये सिरे से नेपाल के साथ अपने संबंध बेहतर करने का प्रयास करना पड़ेगा क्योंकि व्यापारिक कारणों से भी नेपाली आबादी का एक बड़ा भाग भारत के रवैये से अब खुश नहीं है।