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चुनाव आयोग को लेकर अदालती सवाल गंभीर

चुनाव आयोग के मुद्दे पर देश की शीर्ष अदालत में बहस हुई है। इस पर सभी पक्षों ने अपनी बात रखी है। इस पर केंद्र सरकार ने भी अपनी बात रखी है। इस कानूनी बहस के बीच यह सवाल फिर से उभर रहा है कि क्या चुनाव आयोग का वाकई राजनीतिक इस्तेमाल हो रहा है और चुनाव आयोग में बैठे लोग अपनी रजामंदी से ऐसा कर रहे हैं।

पूर्व के कई मामलों को छोड़ भी दें तो इस बार गुजरात के चुनाव कार्यक्रमों के एलान के बाद यह आरोप बहुत स्पष्ट हो गया था कि सिर्फ नरेंद्र मोदी और भाजपा को फायदा पहुंचाने के लिए वहां के चुनाव कार्यक्रम देर से घोषित किये गये। दूसरी तरफ पहले चुनाव होने के बाद भी आयोग ने हिमाचल प्रदेश के चुनावी मिजाज पर खबरों के प्रसारण पर रोक लगा दी। यह दोनों ही फैसले भाजपा को फायदा पहुंचाने वाले माने गये हैं।

अदालत ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर भी सवाल किये थे। इस पर अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने कहा कि हर बार नियुक्ति वरिष्ठता के आधार पर की जाती है। 2-3 अलग-अलग उदाहरणों को छोड़कर पूरे बोर्ड में वह कार्यकाल 5 साल का रहा है। कोर्ट ने पूछा कि क्या ईसी के रूप में नियुक्ति स्तर के लिए कोई तंत्र है और क्या सीईसी के रूप में नियुक्ति के लिए कोई प्रक्रिया है।

इसपर अटॉर्नी जनरल ने कहा यह परंपरा के आधार पर किया जाता है। सीईसी की कोई अलग नियुक्ति प्रक्रिया नहीं है। ईसी के रूप में नियुक्ति होती है और फिर वरिष्ठता के आधार पर सीईसी नियुक्त किया जाता है। संविधान पीठ की अगुवाई कर रहे जस्टिस केएम जोसफ ने फिर नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कोई भी सरकार अपने किसी हां जी, हां जी करने वाले या उन जैसे अधिकारी को ही निर्वाचन आयुक्त बनाना चाहती है।

सरकार को मनचाहा मिल जाता है और अधिकारी को भविष्य की सुरक्षा। ये सब दोनों पक्षों को सही लगता है लेकिन ऐसे में बड़ा सवाल है कि गुणवत्ता का क्या होगा जिस पर गंभीर असर पड़ रहा है?  अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने कहा, 1991 के बाद से हमने निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में हमें कोई खामी नहीं मिली। जहां तक सूचना आयुक्त की नियुक्ति की बात है तो उसमें अंजली भारद्वाज की याचिका पर सुनवाई के दौरान खामियां पाई गई थीं।

कोर्ट ने सूचना आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया के लिए गाइड लाइन बनाई थी। क्योंकि तब सूचना आयुक्तों के खाली पदों और लंबित अर्जियों का मामला भी था। लेकिन चुनाव आयोग में ऐसा कुछ भी नहीं है। जस्टिस जोसफ ने पूछा कि जब आप किसी को निर्वाचन आयुक्त बनाते हैं तभी सरकार को पता रहता है कि कौन कब और कब तक सीईसी बनेगा। जस्टिस अजय रस्तोगी ने भी टिप्पणी की कि सरकार ही तो निर्वाचन आयुक्त नियुक्त करती है, वही तो मुख्य आयुक्त बनते हैं।

ऐसे में ये कैसे कह सकते हैं कि वह सरकार से स्वायत्त हैं।क्योंकि नियुक्ति की प्रक्रिया स्वायत्तता वाली नहीं है। एंट्री लेवल से ही स्वतंत्र प्रक्रिया होनी चाहिए। अटॉर्नी जनरल ने कहा संविधान में मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सीधी नियुक्ति की कोई अवधारणा या प्रावधान नहीं है। इस पर जस्टिस केएम जोसफ ने कहा कि फिर तो हमें देखना होगा कि आयुक्तों की नियुक्ति कैसे हो क्योंकि उन्हीं में से तो सीईसी बनते हैं।

सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने निर्वाचन आयोग पर सवाल उठाते हुए एक उदाहरण के साथ सरकार से पूछा कि क्या कभी किसी पीएम पर आरोप लगे तो क्या आयोग ने उनके खिलाफ एक्शन लिया है?  चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि आपने इसकी न्यायपालिका से तुलना की है। न्यायपालिका में भी नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव आए। मौजूदा सिस्टम में अगर खामी हो तो उसमें सुधार और बदलाव लाजिमी है।

जस्टिस रस्तोगी ने सरकार से पूछा, आप चुनाव आयुक्त की नियुक्ति करते समय सिर्फ नौकरशाहों तक ही सीमित क्यों रहते हैं?  जस्टिस केएम जोसेफ ने कहा हमें एक सीईसी की आवश्यकता है जो पीएम के खिलाफ भी कार्रवाई कर सके। उदाहरण के लिए मान लीजिए कि प्रधान मंत्री के खिलाफ कुछ आरोप हैं और सीईसी को कार्रवाई करनी है। लेकिन सीईसी कमजोर घुटने वाला है। वह एक्शन नहीं लेता है। क्या यह सिस्टम का पूर्ण रूप से ब्रेकडाउन नहीं है?

सीईसी को राजनीतिक प्रभाव से अछूता माना जाता है और स्वतंत्र होना चाहिए। ये ऐसे पहलू हैं जिन पर आपको ध्यान रखना चाहिए। जस्टिस जोसेफ ने कहा कि सीजेआई सीबीआई निदेशक की नियुक्ति में शामिल हैं, वहां लोकतंत्र को कहां से खतरा है।  हमारी अदालतों ने फैसले दिए हैं और उन्हें कार्यपालिका ने स्वीकार किया है। बेंच के सुझाव पर प्रतिक्रिया देते हुए कि सीजेआई को चयन पैनल का हिस्सा होना चाहिए। इसलिए माना जा सकता है कि चुनाव आयोग के हाल के फैसलों पर अब अदालत में बहस करने तक की नौबत आ पड़ी है।