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भारत के लिए भरोसे लायक नहीं है ट्रंप

सत्ता परिवर्तन के वैश्विक खेल में माहिर अमेरिका

  • बांग्लादेश युद्ध का रिकार्ड है हमारे पास

  • उसे सिर्फ अपना हथियार बेचना ही है

  • शेख हसीना का बयान याद रखिए

रजत कुमार गुप्ता

रांचीः पिछले सौ वर्षों का वैश्विक इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि संयुक्त राज्य अमेरिका ने अपने भू-राजनीतिक वर्चस्व और आर्थिक हितों को साधने के लिए शासन परिवर्तन को एक अचूक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया है। 1926 से लेकर 2026 तक की अवधि में अमेरिका का हस्तक्षेप केवल कूटनीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रत्यक्ष सैन्य हमलों, गुप्त तख्तापलट और लक्षित हत्याओं के माध्यम से दुनिया भर की संप्रभुता को चुनौती दी गई है।

ऐतिहासिक शोध, विशेषकर शिकागो और हार्वर्ड विश्वविद्यालय के आंकड़े बताते हैं कि शीतयुद्ध (1947-1989) के दौरान अमेरिका ने लगभग 72 बार विभिन्न देशों की सरकारों को अस्थिर करने का प्रयास किया। इनमें से 66 अभियान गुप्त थे। लैटिन अमेरिका इसका सबसे बड़ा शिकार बना, जहाँ औसतन हर 28 महीने में एक चुनी हुई सरकार को बदलने की कोशिश की गई। 1953 में ईरान के मोहम्मद मोसादेघ और 1973 में चिली के साल्वाडोर अलेंदे की सत्ता का अंत सीआईए समर्थित साजिशों का सबसे चर्चित उदाहरण है।

अमेरिकी सैन्य इतिहास में ऐसे कई मोड़ आए जब दूसरे देशों के शीर्ष नेताओं को सीधे निशाना बनाया गया। 1989 में पनामा के मैनुअल नोरिएगा की गिरफ्तारी हो या 2003 में इराक के सद्दाम हुसैन को बंकर से निकालकर फांसी देना, अमेरिका ने बार-बार यह संदेश दिया कि वह अंतरराष्ट्रीय सीमाओं का सम्मान तभी तक करता है जब तक उसके हित सुरक्षित हैं। लीबिया में मुअम्मर गद्दाफी की हत्या में अमेरिकी ड्रोन की भूमिका और हालिया घटनाक्रम (2026) में वेनेजुएला के निकोलस मादुरो को ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व के तहत पकड़ा जाना इसी शृंखला की कड़ियाँ हैं।

हाल के महीनों (मार्च 2026) में तेहरान में एक हवाई हमले के दौरान ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मृत्यु ने इस नीति को अपने चरम पर पहुंचा दिया है। इसके साथ ही बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना का वह बयान भी चर्चा में है, जिसमें उन्होंने सेंट मार्टिन द्वीप के बदले अपनी सत्ता को अस्थिर करने की साजिश का संकेत दिया था। यह दर्शाता है कि दक्षिण एशिया भी अमेरिका की इस ग्रैंड डिजाइन से अछूता नहीं है।

21वीं सदी में अमेरिका ने अपने तरीकों में बदलाव किया है। अब बमबारी के साथ-साथ आर्थिक प्रतिबंध, कलर रिवोल्यूशन और विपक्षी दलों की फंडिंग जैसे सूक्ष्म हथियारों का प्रयोग किया जा रहा है। जहाँ अमेरिका इसे लोकतंत्र की रक्षा बताता है, वहीं आलोचक इसे आधुनिक साम्राज्यवाद करार देते हैं। भारत जैसे उभरते देशों के लिए यह इतिहास एक कड़ा सबक है कि वैश्विक राजनीति में संप्रभुता केवल अपनी शक्ति और सतर्कता से ही सुरक्षित रह सकती है।