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इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने यूपी पुलिस के आचरण को गलत बताया

थानों के सीसीटीवी फुटेज गायब कैसे हो रहे

नागरिक स्वतंत्रता का हनन हो रहा है

एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर चर्चा

आंधी तूफान से सीसीटीवी फुटेज गायब

राष्ट्रीय खबर

लखनऊः कथित अवैध हिरासत और पुलिस स्टेशनों के सीसीटीवी फुटेज बार-बार गायब होने की घटनाओं पर उत्तर प्रदेश पुलिस को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने कहा कि राज्य में नागरिक स्वतंत्रता की स्थिति कम से कम शब्दों में कहें तो शर्मनाक है। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की पीठ ने टिप्पणी की कि पुलिस के मन में नागरिकों के मौलिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं के प्रति बहुत कम सम्मान प्रतीत होता है, और इन अधिकारों का उल्लंघन यूपी पुलिस के लिए दिनचर्या का मामला बन गया है। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि कथित अवैध हिरासत के मामलों में पुलिस सीसीटीवी खराब होने का बहाना नहीं बना सकती।

उच्च न्यायालय ने यह सख्त टिप्पणियाँ अफ़ज़ल अहमद द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को स्वीकार करते हुए कीं। याचिकाकर्ता का आरोप था कि बिजनौर पुलिस ने उन्हें 5 सितंबर 2026 को हिरासत में लिया था, लेकिन उनकी औपचारिक गिरफ्तारी 7 सितंबर 2026 को दिखाई गई थी। याचिकाकर्ता की बेटी के अनुसार, जब वे पुलिस के बुलाने पर पुलिस स्टेशन पहुँचे थे, तभी सादे कपड़ों में आए पुलिसकर्मियों और एसओजी अधिकारियों ने उनके पिता को ज़बरदस्ती उठा लिया था।

सच्चाई का पता लगाने के लिए अदालत ने 5 सितंबर से 7 सितंबर 2026 के बीच का सीसीटीवी फुटेज मांगा था। इसके जवाब में राज्य सरकार ने अदालत को सूचित किया कि फुटेज उपलब्ध नहीं है, और जनरल डायरी प्रविष्टि का हवाला देते हुए तर्क दिया कि आंधी-तूफान के कारण लैन केबल से पानी सिस्टम में जाने की वजह से सीसीटीवी खराब हो गया था। अदालत ने याचिकाकर्ता को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया और राज्य सरकार को सात दिनों के भीतर 20,000 रुपये का हर्जाना देने का निर्देश दिया।