तमाम संस्थाओं की विफलता की कीमत कौन चुकायेगा
एक दशक के दौरान संस्थागत नियंत्रण और जवाबदेही के कमजोर होने से लोकतांत्रिक सुरक्षा उपायों पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। इसका प्रभाव सिर्फ राजनीति और शिक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक विश्वास और भारत के युवाओं के भविष्य के लिए भी एक बड़ा खतरा बन गया है।
एक युवा भारतीय परीक्षा की तैयारी में साल-दर-साल बिता सकता है, डिग्री हासिल करने के लिए अपने परिवार की जमा-पूंजी दांव पर लगा सकता है और काम की तलाश में कौशल हासिल कर सकता है। फिर भी, यदि इन सभी प्रयासों को नियंत्रित करने वाली संस्थाएं ही विफल हो जाएं, तो इनमें से कोई भी मेहनत इस बात की गारंटी नहीं दे सकती कि उसे एक निष्पक्ष अवसर मिलेगा।
सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं है कि एक छात्र कोई अवसर खो सकता है, बल्कि यह है कि वह वादा जिस पर एक पूरी पीढ़ी ने अपना भविष्य गढ़ा है, वह अब अनिश्चित और अविश्वसनीय लगने लगा है। यही भारत के संस्थागत पतन की वह बड़ी कीमत है जो पिछले एक दशक में चुकानी पड़ी है। जब जवाबदेही कमजोर होती है और सत्ता अत्यधिक केंद्रीकृत हो जाती है, तो उसके परिणाम केवल संसद या सरकारी दफ्तरों तक सीमित नहीं रहते।
वे कक्षाओं, परीक्षा हॉल और कार्यस्थलों तक पहुँच जाते हैं। इसका सबसे बड़ा खामियाजा अंततः भारत के युवाओं को ही भुगतना पड़ता है। संस्थाएं रातोंरात अपना अधिकार नहीं खोती हैं। उनकी प्रभावशीलता धीरे-धीरे कम होती जाती है—जैसे-जैसे स्वतंत्र जाँच असुविधाजनक लगने लगती है, असहमति को देशद्रोह या निष्ठाहीनता के रूप में देखा जाने लगता है, और जवाबदेही राजनीतिक सुविधा के आगे झुक जाती है।
संसद आज भी काम करती है, चुनाव होते हैं और संवैधानिक निकायों के पास औपचारिक शक्तियां भी हैं। लेकिन लोकतंत्र को केवल अपनी संरचनाओं के जीवित रहने की ही नहीं, बल्कि उनके सक्रिय रहने की जरूरत होती है। लोकतंत्र चाहता है कि ये संरचनाएं फैसलों की सूक्ष्मता से जाँच करें, कमियों को उजागर करें और गलतियों को समय रहते सुधारें।
संसद का ही उदाहरण लें। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के अनुसार, 17वीं लोकसभा में केवल 16 प्रतिशत विधेयकों को विस्तृत जाँच के लिए समितियों के पास भेजा गया था, जबकि 15वीं लोकसभा में यह आंकड़ा 71 प्रतिशत था। करोड़ों नागरिकों को प्रभावित करने वाले कानून गहन परीक्षण, विशेषज्ञ इनपुट और सार्थक बहस के हकदार होते हैं।
जब ऐसी जाँच का दायरा घटता है, तो इसका जोखिम यह होता है कि खामियां तब तक छिपी रहती हैं जब तक नागरिकों को उनका गंभीर परिणाम नहीं भुगतना पड़ता। संस्थागत विफलता का यह दर्द शिक्षा के क्षेत्र में सबसे स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। परिवार अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए भारी त्याग करते हैं, जबकि छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं में अपने कई बहुमूल्य वर्ष झोंक देते हैं जो उनके पूरे भविष्य का निर्धारण करती हैं।
इसलिए ऐसी परीक्षाओं की विश्वसनीयता कोई महज प्रशासनिक चिंता नहीं है, बल्कि यह एक बहुत बड़ा सार्वजनिक विश्वास है। 2026 में नीट यूजी में हुई अनियमितताओं के खिलाफ छात्रों का उग्र आंदोलन जंतर-मंतर से आगे बढ़कर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर जाकर समाप्त हुआ, जिसने इस विश्वास के संकट को पूरी तरह बेनकाब कर दिया।
निष्पक्षता की मांग कर रहे छात्र एक बुनियादी सवाल पूछ रहे थे: यदि योग्यता को मापने वाली पूरी प्रक्रिया ही भरोसे के लायक नहीं है, तो उस योग्यता का क्या मूल्य रह जाता है? एक मंत्री का इस्तीफा राजनीतिक जवाबदेही का एक कदम हो सकता है, लेकिन यह अपने आप में कोई संस्थागत सुधार नहीं है।
वास्तविक परीक्षा इस बात की है कि क्या हमारी परीक्षा प्रणालियाँ अधिक सुरक्षित बन पाती हैं, क्या जिम्मेदारी तय होती है, शिकायतों का समय पर निपटारा होता है और जिन लोगों ने साबित हो चुकी गड़बड़ियों के कारण अपने अवसर खोए हैं, क्या उन्हें न्याय मिलता है। यह चुनौती केवल परीक्षाओं से कहीं आगे तक जाती है।
विश्वविद्यालयों को अकादमिक स्वतंत्रता, विश्वसनीय नेतृत्व और स्वतंत्र सोच के लिए एक खुले माहौल की आवश्यकता होती है। व्यावसायिक शिक्षा को युवाओं को ऐसे कौशल से लैस करना होगा जिसे नियोक्ता स्वीकार करें और जिसकी अर्थव्यवस्था को वास्तव में जरूरत हो। वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बनने की आकांक्षा रखने वाला देश ऐसी योग्यता वाली पीढ़ी का जोखिम नहीं उठा सकता जिस पर वह खुद भरोसा न कर सके, या जिसके कौशल का वह उपयोग न कर सके, या जहाँ अवसर योग्यता के बजाय सिफारिशों और संपर्कों से तय होते हों। यह समस्या शिक्षा के दायरे से भी बहुत आगे तक फैली हुई है। एक स्वस्थ लोकतंत्र को स्वतंत्र जाँच, एक स्वतंत्र प्रेस और ऐसी संस्थाओं की आवश्यकता होती है जो बिना किसी राजनीतिक परिणाम के डर के सरकार से सीधे सवाल पूछने की ताकत रखती हों।