सर्बिया टीवी पर माफी और भारतीय परिदृश्य
हाल ही में यूरोपीय देश सर्बिया से आई एक राजनीतिक खबर ने वैश्विक स्तर पर मीडिया की भूमिका और जन-आकांक्षाओं के प्रभाव को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। सर्बिया के सार्वजनिक प्रसारक रेडियो टेलीविजन ऑफ वोज्वोदिना (आरटीवी) ने वर्षों तक सत्तापक्ष के पक्षपातपूर्ण और आलोचना-रहित समाचार दिखाने के लिए अपने दर्शकों से सार्वजनिक रूप से माफ़ी मांगी है। यह माफ़ी सर्बिया में राष्ट्रपति अलेक्सांद्र वुचिच के नेतृत्व वाले सत्तारूढ़ गठबंधन को पछाड़कर छात्र-नेतृत्व वाले स्टूडेंट आंदोलन की संसदीय चुनाव में शानदार जीत के बाद आई है।
आरटीवी के समाचार एंकर गोरान एरॉर ने बुलेटिन की शुरुआत में खुलकर स्वीकार किया कि वर्षों तक मीडिया अपने संवैधानिक और नैतिक कर्तव्यों का पालन करने में विफल रहा। उन्होंने कहा कि मीडिया मौन रहा, एकतरफा रिपोर्टिंग की और जनहित के सवाल पूछने में नाकाम रहा। इस प्रकरण के बाद आरटीवी के मुख्य संपादक को इस्तीफा देना पड़ा। यह घटना न केवल सर्बियाई राजनीति के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र और मीडिया व्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में भी एक गहरा आत्ममंथन प्रस्तुत करती है। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहाँ मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है।
मीडिया का प्राथमिक कार्य जनता को जागरूक करना, निष्पक्ष जानकारी देना और सत्ता में बैठे लोगों से जवाबदेही तय करना है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में भारत में भी मीडिया की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और गोदी मीडिया या सत्ता-समर्थक पत्रकारिता को लेकर व्यापक चिंताएं व्यक्त की गई हैं। सर्बिया की घटना भारत के लिए कई प्रमुख बिंदुओं पर विचार करने का अवसर देती है।
भारत में प्रसार भारती (दूरदर्शन और आकाशवाणी) देश का सार्वजनिक प्रसारक है। भारतीय संविधान और प्रसार भारती अधिनियम का उद्देश्य इसे एक स्वतंत्र निकाय बनाना था, जो किसी भी सरकार के प्रभाव से मुक्त होकर देश की जनता को निष्पक्ष समाचार दे सके। सर्बिया में आरटीवी द्वारा अपनी गलतियों को स्वीकार करना यह दर्शाता है कि जब सार्वजनिक प्रसारक सत्ता के दबाव में काम करते हैं, तो वे अपनी साख खो देते हैं।
भारत के संदर्भ में भी यह मांग अक्सर उठती रहती है कि सार्वजनिक प्रसारण तंत्र को पूर्ण रूप से प्रशासनिक और संपादकीय स्वायत्तता दी जानी चाहिए ताकि वे सत्ता के बजाय देश की जनता के प्रति जवाबदेह रहें। सर्बिया में छात्रों की जीत यह साबित करती है कि जब देश की स्थापित राजनीतिक व्यवस्था और मीडिया संस्थानों में भ्रष्टाचार या पक्षपात बढ़ता है, तो युवा और छात्र वर्ग परिवर्तन का सबसे मजबूत माध्यम बनते हैं।
भारत का इतिहास भी छात्र आंदोलनों से समृद्ध रहा है—चाहे वह 1974 का जेपी (जयप्रकाश नारायण) आंदोलन हो, असम आंदोलन हो, या हाल के वर्षों में शिक्षा, रोजगार और लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर हुए देशव्यापी छात्र प्रदर्शन हों। सर्बिया की घटना भारतीय युवाओं के लिए एक संदेश है कि लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के माध्यम से नीतिगत सुधार (जैसे मीडिया स्वतंत्रता, भ्रष्टाचार-विरोधी कानून और पारदर्शी शासन) संभव हैं।
सर्बिया में चुनाव परिणामों के बाद जनता का गुस्सा न केवल आरटीवी जैसे सार्वजनिक प्रसारकों पर दिखा, बल्कि इन्फॉर्मर टीवी जैसे निजी सत्ता-समर्थक मीडिया संस्थानों के दफ्तरों में भी प्रदर्शन देखने को मिले। भारत में भी टीआरपी आधारित पत्रकारिता, सनसनीखेज खबरों और एकतरफा डिबेट्स के कारण मुख्यधारा मीडिया पर आम जनता का विश्वास घट रहा है।
यही कारण है कि भारत में स्वतंत्र डिजिटल मीडिया, स्वतंत्र पत्रकारों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की ओर लोगों का झुकाव तेजी से बढ़ा है। सर्बिया का यह घटनाक्रम भारत के मीडिया घरानों के लिए एक चेतावनी है कि यदि वे निष्पक्षता का त्याग करेंगे, तो देर-सबेर उन्हें जन-अविश्वास का सामना करना पड़ेगा। रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स द्वारा जारी किए जाने वाले विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में सर्बिया और भारत दोनों को ही मीडिया स्वतंत्रता के मामले में चुनौतियों का सामना करना पड़ता रहा है।
सर्बिया में स्टूडेंट लिस्ट के घोषणापत्र में मीडिया स्वतंत्रता, संस्थागत जवाबदेही और कानून के शासन को प्रमुख स्थान दिया गया है। भारत के लिए भी यह समय की मांग है कि प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा की जाए, पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए और मीडिया में एकाधिकार को रोककर विविधता और निष्पक्षता को प्रोत्साहन दिया जाए। सर्बियाई प्रसारक की माफ़ी और छात्र आंदोलन की जीत केवल एक देश का राजनीतिक घटनाक्रम नहीं है; यह वैश्विक स्तर पर पत्रकारिता के गिरते मानकों और उनके खिलाफ उठती जन-आवाज का प्रतीक है।
भारतीय लोकतंत्र के लिए यह एक स्पष्ट सबक है कि मीडिया यदि अपने धर्म का पालन नहीं करेगा, तो लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर होंगी। निष्पक्ष पत्रकारिता ही किसी भी जीवंत लोकतंत्र की रीढ़ होती है। सर्बिया की यह घटना भारतीय मीडिया, नीति निर्माताओं और नागरिकों को यह याद दिलाती है कि जनहित के सवाल पूछना और सत्ता से जवाबदेही मांगना ही पत्रकारिता की असली पहचान है।