दिल्ली हाईकोर्ट में पूरे देश में गूंज रहा सवाल खड़ा है
बॉंड भरने को भी चुनौती दी गयी है
नोटिस के आधार पर कानूनी सवाल
मंडी हाउस के पास हिरासत में लिया
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः दिल्ली उच्च न्यायालय में ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन की अध्यक्ष नेहा बोरा द्वारा दायर याचिका से जुड़ा यह मामला एक महत्वपूर्ण कानूनी और नागरिक अधिकारों के दायरे को रेखांकित करता है। उन्होंने विशेष कार्यकारी स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के समक्ष शांति बनाए रखने यानी पीस बॉन्ड भरने के लिए दिल्ली पुलिस द्वारा जारी किए गए नोटिस को चुनौती दी है।
न्यायालय के समक्ष सुनवाई के दौरान नेहा बोरा का पक्ष रख रहे वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरणारायणन ने जोरदार तरीके से यह तर्क रखा कि नागरिकों को अपने देश का राष्ट्रीय ध्वज यानी तिरंगा फहराने के लिए किसी भी प्रकार की सरकारी या प्रशासनिक अनुमति की बिल्कुल आवश्यकता नहीं होती है।
यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब दिल्ली पुलिस ने अपनी नोटिस में इस बात का मुख्य आधार बनाया कि नेहा बोरा ने बिना पूर्व अनुमति के राष्ट्रीय ध्वज फहराया था। इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए वरिष्ठ वकील ने न्यायमूर्ति सुब्रह्मण्यम प्रसाद की पीठ के समक्ष सवाल उठाया कि क्या इस नोटिस में वास्तव में कोई कानूनी आधार या सार है? उन्होंने कहा कि पुलिस अधिकारियों को एक बार फिर से कानून की सही शिक्षा और पाठ पढ़ाने की सख्त आवश्यकता है।
न्यायालय को दी गई आधिकारिक जानकारी के अनुसार, नेहा बोरा को 16 अक्टूबर की शाम को मंडी हाउस पहुंचने के मात्र दस से पंद्रह मिनट के भीतर ही पुलिस द्वारा हिरासत में ले लिया गया था। उनके अधिवक्ताओं ने स्पष्ट किया कि उस तय तारीख पर उन्होंने किसी भी प्रकार का कोई अपराध नहीं किया था और न ही उनके किसी कार्य से सार्वजनिक शांति या कानून व्यवस्था में कोई व्यवधान उत्पन्न हुआ था, जिसके चलते शांति बॉन्ड की यह कार्रवाई पूरी तरह से निराधार और कानून के विरुद्ध है। यह मामला नागरिकों के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है।