चुनाव आयोग से साफ्टवेयर के दुरुपयोग के और प्रमाण मिले
कोई प्रशासनिक आदेश उपलब्ध नहीं है
थोक भाव में यह काम अब भी जारी है
आयोग का कंप्यूटर ऐसा कर रहा है
राष्ट्रीय खबर
नई दिल्ली: चुनावी पंजीकरण अधिकारियों द्वारा डिजिटल रूप से हस्ताक्षरित ऑटो-जनरेटेड फॉर्म 7 के माध्यम से विशेष गहन पुनरीक्षण के चरण 2 और 3 के दौरान भले ही हजारों मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हों, लेकिन यह पाया गया है कि राज्य चुनाव अधिकारी भारत निर्वाचन आयोग द्वारा जारी किसी भी लिखित प्रोटोकॉल या मानक संचालन प्रक्रिया के बिना इस प्रक्रिया को अंजाम दे रहे हैं। चुनावी नियमों के तहत ईआरओ या सहायक ईआरओ के लिए स्वयं फॉर्म 7 दाखिल करने का कोई प्रावधान न होने के बावजूद, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के चुनाव अधिकारियों ने अनसुलझी तार्किक विसंगतियों और मैप न किए गए पाए गए मतदाताओं के मामलों में मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए अपने डिजिटल हस्ताक्षर वाले फॉर्म 7 ऑटो-जनरेट किए हैं।
उत्तराखंड में कांग्रेस पार्टी ने आरोप लगाया था कि राज्य में मामूली त्रुटियों को चिह्नित करने के लिए डिलीशन अनुरोधों को ऑटो-जनरेट किया गया था और इसने राज्य के जिलों में चयनात्मक रूप से काम किया ताकि उसके मतदाताओं को नुकसान पहुँचाया जा सके। यानी, निर्वाचन आयोग का ईरोनेट सॉफ्टवेयर नाम में मामूली बेमेल, भाई-बहनों या माता-पिता और बच्चों के बीच उम्र के अंतर के साथ-साथ छह से अधिक बच्चों वाले माता-पिता को तार्किक विसंगति के रूप में चिह्नित करता है।
उत्तराखंड में मतदाता सूची के एसआईआर के दौरान दाखिल किए गए लगभग 1.73 लाख फॉर्म 7 आवेदनों में से 95,000 से अधिक को अयोग्य के रूप में चिह्नित किया गया है। मैनुअल ऑन इलेक्टोरल रोल्स, 2024 के अनुसार, ईआरओ के लिए फॉर्म 7 दाखिल करने का कोई प्रावधान नहीं है। ईआरओ, जो इस प्रक्रिया में न्यायनिर्णायक होता है, अयोग्य पाए गए नाम को हटा सकता है।
नियमों के अनुसार, फॉर्म 7 केवल उसी व्यक्ति द्वारा दाखिल किया जा सकता है जिसका नाम पहले से ही उस मतदाता सूची में शामिल है जिसमें आपत्ति वाला नाम दर्ज है।
इससे पहले, बड़ी संख्या में फॉर्म 7 दाखिल किए जाने पर कड़ी आलोचना का सामना करने के बाद, निर्वाचन आयोग ने 9 अक्टूबर को एक व्यक्ति द्वारा जमा किए जा सकने वाले आवेदनों की संख्या को सीमित करके अधिकतम 10 कर दिया था।