तिरंगा मार्च में आने से पहले पुलिस ने किया था गिरफ्तार
फिर से बॉंड पर हस्ताक्षर कराया
पचास हजार रुपये का बॉंड भरा गया
दो नेता अब भी न्यायिक हिरासत में
राष्ट्रीय खबर
नई दिल्ली: दिल्ली की एक अदालत ने शनिवार को कॉककोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके की सशर्त रिहाई का आदेश दिया। उन्हें कथित चुनावी धांधली के खिलाफ चल रहे विरोध प्रदर्शनों के तहत कनॉट प्लेस मार्च के लिए जाने की योजना बनाने के दौरान हिरासत में लेने और फिर गिरफ्तार करने के अगले दिन यह आदेश मिला।
सूत्रों के अनुसार, उन्हें पचास हजार रुपये का बांड भरने और यह घोषणा करने का आदेश दिया गया कि वह शांति भंग नहीं करेंगे। मजिस्ट्रेट के समक्ष सुनवाई के तुरंत बाद वह मंदिर मार्ग थाने से बाहर आ गए। दिल्ली पुलिस ने बताया कि दिपके के अलावा, ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन की अध्यक्ष नेहा बोरा शुक्रवार को हिरासत में ली गई दूसरी प्रमुख युवा नेता थीं। बोरा को शनिवार तड़के रिहा कर दिया गया, जबकि दिपके को एक विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया।
अलग से, जंतर-मंतर पर अनधिकृत प्रवेश के मामले में सीजेपी नेता आशुतोष रांका और सौरभ दास न्यायिक हिरासत में हैं, क्योंकि पिछले सप्ताह इस स्थल को विरोध प्रदर्शन स्थल के रूप में रद्द कर दिया गया था।
पुलिस ने बताया कि कनॉट प्लेस में लहरा दो तिरंगा विरोध मार्च से पहले नेहा बोरा और अभिजीत दिपके को निवारक हिरासत में लिया गया था, जहां शुक्रवार शाम को राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फहराने की योजना थी। इसके बावजूद छात्रों और अन्य लोगों द्वारा झंडा लेकर छोटे मार्च निकाले गए। इससे पहले, जब दिपके को 10 अक्टूबर को दिल्ली हवाई अड्डे पर एक उड़ान के अंदर से हिरासत में लिया गया था, तब शांति भंग का एक अलग मामला दर्ज किया गया था। उनसे एक साल तक शांति भंग न करने का संकल्प पत्र (बांड) भरवाया गया था।
इस बीच, रिहा होने के बाद नेहा बोरा ने दिल्ली पुलिस और केंद्र की भाजपा सरकार की आलोचना करते हुए इन हिरासत को अवैध करार दिया। आंदोलन को लेकर प्रदर्शनकारियों को रात भर हिरासत में रखने पर सवाल उठाया और कहा कि महिलाओं को सूर्यास्त के बाद रिहा किया जाना चाहिए।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पुलिस ने उन्हें घंटों तक वकील से मिलने नहीं दिया। दिल्ली पुलिस के अनुसार, बोरा को 16 अक्टूबर की शाम को निवारक प्रावधानों के तहत हिरासत में लिया गया था और दिल्ली पुलिस अधिनियम की धारा 65 के तहत औपचारिक प्रक्रियाओं के बाद शनिवार तड़के रिहा कर दिया गया। बोरा ने कहा, यह किस अधिकार के तहत उचित है? किस कानून या आदेश के तहत हिरासत में लिए गए लोगों को पूरी रात हिरासत में रखना स्वीकार्य है? कानूनी रूप से, व्यक्तियों, विशेष रूप से महिलाओं को सूर्यास्त के बाद रिहा किया जाना चाहिए, फिर भी ऐसा नहीं हो रहा है।
उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस ने उनकी व्यक्तिगत जानकारी तो मांगी, लेकिन उन्हें लंबे समय तक किसी वकील से बात करने या परामर्श करने की अनुमति नहीं दी। उन्होंने कहा, हमारे वकीलों ने मुझ तक पहुंचने के लिए 5 से 6 घंटे प्रयास किए। आखिरकार जब हम उन्हें फोन करने में सफल रहे, तब जाकर उन्हें मुझसे मिलने की अनुमति दी गई।