फिल्मी चकाचौध से अलग रहकर किरदार निभाने वाला
मुंबईः भारतीय सिनेमा जगत के सबसे बहुमुखी, बेबाक और अपने संजीदा अभिनय के लिए पहचाने जाने वाले दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का जीवन न केवल फिल्मी पर्दे पर उनकी कलात्मक प्रतिभा के लिए याद किया जाएगा, बल्कि वास्तविक जीवन में देश के प्रति उनकी अटूट निष्ठा और भारतीय सेना के साथ उनके गहरे व अनूठे रिश्ते के लिए भी हमेशा स्वर्ण अक्षरों में लिखा रहेगा।
गत 8 अक्टूबर 2026 को गोवा में 75 वर्ष की आयु में जब इस महान कलाकार ने अपनी आखिरी सांस ली, तो उनके निधन से पूरा देश शोक में डूब गया। हालांकि उनके फिल्मी सफर, यादगार किरदारों और अनगिनत पुरस्कारों पर तो देश भर से श्रद्धांजलि अर्पित की जा रही है, लेकिन उनके जीवन का एक ऐसा पहलू भी है जो बेहद प्रेरणादायक और असाधारण रहा है—वह है उनका भारतीय सेना के साथ दो दशकों से अधिक लंबा जुड़ाव और कारगिल युद्ध के दौरान अग्रिम मोर्चे पर निभाई गई उनकी अनकही सेवाएं।
सेना के साथ नाना पाटेकर के इस अनोखे और अटूट रिश्ते की नींव एक फिल्म के जरिए पड़ी थी। साल 1991 में रिलीज हुई फिल्म प्रहार: द फाइनल अटैक उनके निर्देशन में बनी पहली फिल्म थी, जिसने सिनेमाघरों में तहलका मचा दिया था। इस फिल्म में एक भारतीय सेना के अधिकारी की भूमिका को पूरी प्रमाणिकता और यथार्थता के साथ पर्दे पर उतारने के लिए नाना पाटेकर ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी।
इसके लिए उन्होंने मराठा लाइट इन्फैंट्री रेजिमेंटल सेंटर में जाकर एक नियमित सेना अधिकारी की तरह बेहद कठोर, कठिन और अनुशासनबद्ध शारीरिक प्रशिक्षण प्राप्त किया था। उनकी यह कड़ी ट्रेनिंग किसी साधारण कार्यशाला की तरह नहीं, बल्कि पूरे तीन साल तक लंबी चली थी, जिसने उनके भीतर एक सच्चे सैनिक के गुणों को पूरी तरह से स्थापित कर दिया था।
इस तीन साल के लंबे और कड़े सैन्य प्रशिक्षण के परिणामस्वरूप, भारतीय सेना और सरकार ने उनकी निष्ठा को सम्मान देते हुए 1990 में उन्हें भारतीय प्रादेशिक सेना में मानद कैप्टन की प्रतिष्ठित रैंक प्रदान की थी। एक अभिनेता होने के साथ-साथ वे राष्ट्रीय स्तर के एक उत्कृष्ट निशानेबाज भी थे। उन्होंने सेना के साथ अपने प्रशिक्षण के दौरान एक कठिन कमांडो कोर्स भी सफलतापूर्वक पूरा किया था और 300 मीटर राइफल शूटिंग श्रेणी में अचूक निशाना लगाने की अपनी असाधारण क्षमता का परिचय दिया था। सेना के प्रति उनका यह समर्पण किसी दिखावे का नहीं, बल्कि उनके खून में रची-बसी देशभक्ति का प्रमाण था।
नाना पाटेकर के सैन्य जीवन का सबसे स्वर्णिम और रोमांचक अध्याय वर्ष 1999 में लिखे गए कारगिल युद्ध के दौरान जुड़ा। मई 1999 के शुरुआती दिनों में जब देश की उत्तरी सीमाओं पर कारगिल में पाकिस्तानी घुसपैठियों के खिलाफ जंग छिड़ी और भारतीय सेना ने ऑपरेशन विजय का आगाज किया, तो राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत नाना पाटेकर का मन बेचैन हो उठा।
वे अभिनेता होने के नाते सुरक्षित स्टूडियो में बैठने के बजाय सीधे युद्ध के मैदान में, अग्रिम मोर्चे पर जाकर देश के लिए कुछ करना चाहते थे। जब उन्होंने सेना के वरिष्ठ अधिकारियों से फ्रंटलाइन पर जाने की अनुमति मांगी, तो शुरुआत में प्रशासनिक और प्रक्रियागत कारणों का हवाला देते हुए उन्हें अनुमति देने से इनकार कर दिया गया। अधिकारियों का कहना था कि यह युद्ध क्षेत्र है और किसी सिविलियन या मानद अधिकारी के लिए वहां जाना नियमों के तहत संभव नहीं है, जब तक कि देश के रक्षा मंत्री खुद इसकी विशेष अनुमति न दें।
हार न मानते हुए, नाना पाटेकर ने तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस से सीधा संपर्क किया और फोन पर अपनी बात रखी। रक्षा मंत्री के साथ अपनी बातचीत में उन्होंने पूरी दृढ़ता से अपना पक्ष रखा कि भले ही सामान्य नियमों के तहत छह महीने के प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है, लेकिन उन्होंने मराठा लाइट इन्फैंट्री के साथ पूरे तीन साल की कठोर ट्रेनिंग ली है, वे एक प्रशिक्षित कमांडो हैं और राष्ट्रीय स्तर के शूटर हैं। उनकी इस राष्ट्रभक्ति और जिद को देखते हुए रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस ने उन्हें विशेष अनुमति प्रदान कर दी।
इस प्रकार, तमाम बाधाओं को पार करते हुए, जुलाई 1999 में आधिकारिक तौर पर युद्ध समाप्त होने के ठीक बाद, अगस्त 1999 में नाना पाटेकर वास्तविक नियंत्रण रेखा के बेहद करीब, कारगिल के रणक्षेत्र में जा पहुंचे। एक मानद कैप्टन के रूप में उन्होंने एलओसी के पास अग्रिम इलाकों में दो सप्ताह से अधिक का लंबा समय बिताया। उनका यह प्रवास किसी वीआईपी दौरे की तरह नहीं था, बल्कि उन्होंने पूरी तरह से एक आम और अनुशासित सैनिक की तरह मैदानी कामकाज संभाला। उन्होंने बेस अस्पताल में एक समर्पित स्वयंसेवक के रूप में घायल वीर जवानों की सेवा की, और क्विक रिस्पांस टीम के साथ कंधे से कंधा मिलाकर रणनीतिक अभियानों, सुरक्षा गश्त और रसद प्रबंधन में अभूतपूर्व मदद पहुंचाई।
यह अनुभव शारीरिक रूप से उनके लिए बेहद कष्टदायक और चुनौतीभरा था। दुर्गम भौगोलिक स्थिति, बर्फीली हवाओं और युद्ध के तनाव के बीच काम करने का उनके शरीर पर गहरा असर पड़ा। जब वे श्रीनगर पहुंचे थे, तब उनका वजन 76 किलोग्राम था, लेकिन अग्रिम मोर्चे पर दो सप्ताह की इस कठिन और थका देने वाली शारीरिक सेवा के बाद जब वे वापस लौटे, तो उनका वजन घटकर मात्र 56 किलोग्राम रह गया था—यानी उन्होंने महज कुछ ही हफ्तों में अपने शरीर का 20 किलोग्राम वजन सिर्फ इसलिए गंवा दिया क्योंकि वे पूरी शिद्दत से सैनिकों के साथ काम कर रहे थे। उन्होंने बाद में खुद साझा किया था कि यह अनुभव उनके जीवन का सबसे अधिक शारीरिक रूप से थका देने वाला, लेकिन आंतरिक रूप से सबसे अधिक संतोषजनक और भावनात्मक रूप से परिपूर्ण अनुभव था।
कारगिल युद्ध के बाद वे वापस अपनी सामान्य दुनिया और फिल्मी पर्दे पर लौटे, जहां उन्होंने कोहराम जैसी फिल्मों में एक अंडर कवर आर्मी इंटेलिजेंस ऑफिसर के रूप में अपनी कला का जौहर दिखाया, लेकिन अब उनके उन किरदारों में बनावटीपन नहीं बल्कि अनुभव की असली चमक थी। भारतीय सेना के साथ उनका यह नाता किसी फिल्म की शूटिंग तक सीमित नहीं रहा, बल्कि दशकों तक अटूट रूप से जारी रहा।
उन्होंने वर्ष 1990 से लेकर 2013 तक लंबे समय तक प्रादेशिक सेना में अपनी गौरवशाली सेवाएं दीं। अंततः, वर्ष 2013 में 62 वर्ष की आयु में वे लेफ्टिनेंट कर्नल के गरिमामयी पद से आधिकारिक रूप से सेवानिवृत्त हुए। संयोगवश, उसी वर्ष यानी 2013 में राष्ट्र ने उनकी कला, समाज सेवा और सेना के प्रति समर्पण को सम्मानित करते हुए उन्हें देश के चौथे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म श्री से अलंकृत किया। नाना पाटेकर का जीवन इस बात की सबसे बड़ी मिसाल है कि एक कलाकार केवल अपनी कला से ही नहीं, बल्कि अपने देश के प्रति अटूट निष्दा और बलिदान की भावना से भी अमर हो सकता है।