तीनों प्रमुख दल पूरी ताकत से मैदान में उतरे
भाजपा ने ग्राम स्वराज संकल्प दिवस मनाया
इस चुनाव का असर अगले वि. सभा चुनाव में
ग्राम पंचायतों का आर्थिक फंड भी प्रभावी है
राष्ट्रीय खबर
भुवनेश्वरः गत 2 अक्टूबर 2024 को महात्मा गांधी की जयंती के अवसर पर जहां एक ओर पूरा देश ग्राम स्वराज और स्वच्छता के संकल्प में जुटा था, वहीं दूसरी ओर ओडिशा की राजनीति में एक नया भूचाल आ गया। राज्य में वर्ष 2027 में होने वाले त्रि-स्तरीय पंचायत चुनावों का बिगुल आधिकारिक रूप से बज चुका है।
इस राजनीतिक रणकौशल में राज्य की तीनों प्रमुख राजनीतिक पार्टियां—सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), मुख्य विपक्षी बीजू जनता दल (बीजद) और कांग्रेस—पूरी ताकत से मैदान में उतर आई हैं। सभी दलों ने जमीनी स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए पंचायत दखल अभियान का ऐलान कर दिया है, जिससे राज्य की ठंडी पड़ती राजनीति का पारा अचानक काफी हाई हो गया है।
सत्तारूढ़ भाजपा ने इस बार गांधी जयंती को ग्राम स्वराज संकल्प दिवस के रूप में मनाते हुए अपनी चुनावी रणनीति का स्पष्ट संदेश दे दिया है। मुख्यमंत्री द्वारा बालेसर के चांदीपुर से विकसित पंचायत रथ को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया गया। पार्टी नेताओं का मानना है कि यदि राज्य की कुल 6,794 पंचायतों में से कम से कम 60 प्रतिशत सीटों पर पार्टी के समर्थित सरपंच काबिज हो जाते हैं, तो वर्ष 2029 के विधानसभा चुनावों तक उनकी स्थिति को कोई नहीं हिला सकेगा।
दूसरी तरफ, लगातार 24 वर्षों तक सत्ता में रहने के बाद वर्तमान में विपक्ष की भूमिका निभा रही बीजद की जड़ें ग्रामीण इलाकों में सबसे गहरी मानी जाती हैं। पार्टी सुप्रीमो नवीन पटनायक ने इसी दिन से आम गाँ आमो गौरव यात्रा का शुभारंभ कर दिया है। बीजद का मुख्य नारा है कि भाजपा दिल्ली की पार्टी है, जबकि बीजद गांव की माटी की पार्टी है। बीजद ने आरोप लगाया है कि वर्तमान सरकार सरकारी तंत्र और प्रशासनिक अधिकारियों के जरिए पंचायतों पर कब्जा करना चाहती है।
इस राजनीतिक संघर्ष में कांग्रेस भी खुद को एक मजबूत तीसरे विकल्प के रूप में पेश कर रही है। पार्टी ने कोरापुट, नवरंगपुर, रायगदा और बलांगीर से गांधी पथ पर ओडिशा पदयात्रा की शुरुआत की है।
इसका मुख्य कारण आज के समय में एक ग्राम पंचायत को मनरेगा, 15वें वित्त आयोग, आवास और सड़क योजनाओं को मिलाकर सालाना एक से दो करोड़ रुपये तक का फंड प्राप्त होता है, और सरपंच के हस्ताक्षर के बिना गांव में एक ईंट भी नहीं रखी जा सकती। यही वजह है कि पंचायतों पर अधिकार जमाने के लिए यह लड़ाई छिड़ी है, जिसकी गूंज सीधे 2027 के पंचायत और 2029 के विधानसभा चुनावों तक सुनाई देगी।