पश्चिम बंगाल पुलिस की पहल पर अदालती ब्रेक लगा
भाजपा से सीधी टक्कर चल रही है
नफरती भाषण का मामला बनाया था
फिलहाल उनकी गिरफ्तारी नहीं होगी
राष्ट्रीय खबर
कोलकाताः पश्चिम बंगाल की राजनीति और कानूनी गलियारों में उस समय एक महत्वपूर्ण मोड़ देखने को मिला, जब कलकत्ता उच्च न्यायालय ने तृणमूल कांग्रेस की वरिष्ठ नेता और सांसद महुआ मोइत्रा को एक बड़ी राहत प्रदान की। उच्च न्यायालय की एक पीठ ने नफरती भाषण से जुड़े मामले में कृष्णनगर की निचली अदालत द्वारा मोइत्रा के खिलाफ जारी किए गए गैर-जमानती गिरफ्तारी वारंट के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगा दी है।
न्यायमूर्ति देबांगशु बसाक और न्यायमूर्ति आर्यक दत्त की खंडपीठ ने महुआ मोइत्रा द्वारा दायर उस याचिका पर सुनवाई करते हुए यह अंतरिम राहत दी, जिसमें उन्होंने कृष्णनगर अदालत के समक्ष लंबित पूरी शिकायत प्रक्रिया को ही रद्द करने की मांग की थी। उच्च न्यायालय ने मामले की गंभीरता को देखते हुए स्पष्ट निर्देश दिया है कि 30 सितंबर 2026 तक या जब तक कि अदालत की ओर से अगला आदेश जारी न किया जाए, तब तक पुलिस 19 अगस्त 2026 को जारी किए गए गिरफ्तारी वारंट को निष्पादित नहीं करेगी।
यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब 19 अगस्त 2026 को कृष्णनगर की निचली अदालत ने महुआ मोइत्रा के लगातार अदालत के समक्ष पेश न होने के कारण उनके खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए वारंट जारी कर दिया था। हालांकि, उच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान सांसद के कानूनी सलाहकारों ने यह बिंदु उठाया कि शिकायत का मूल आधार और जिस अदालत ने यह आदेश दिया है, उसका क्षेत्राधिकार ही कानूनी जांच के दायरे में आता है।
मोइत्रा के वकीलों—अधिवक्ता देबाशीष रॉय, अर्क कुमार नाग, सोहम दे धारा, सुभम दास और आकाश घोष—ने तर्क दिया कि 18 जून को स्थानीय बार एसोसिएशन द्वारा पारित एक प्रस्ताव के कारण याचिकाकर्ता सुनवाई में भाग लेने से असमर्थ रही थीं। इसके अतिरिक्त, वकीलों ने यह मुख्य तर्क भी पेश किया कि जिस अदालत में शिकायत लंबित है, उसके पास इस मामले पर सुनवाई का कानूनी क्षेत्राधिकार ही नहीं है। गौरतलब है कि मोइत्रा के खिलाफ यह शिकायत कथित रूप से महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुंचाने और नफरत फैलाने वाले बयान देने के आरोपों में दर्ज की गई थी।
दूसरी ओर, राज्य सरकार की ओर से पेश हुए लोक अभियोजक कल्लोल मोंडल, अधिवक्ता पवन गुप्ता और अनामित्रा बनर्जी ने सरकार का पक्ष रखा। उच्च न्यायालय ने माना कि क्षेत्राधिकार से जुड़े मुद्दों पर विस्तृत विचार-विमर्श जरूरी है, जिसके बाद ही अंतिम फैसला लिया जाएगा।