नोटबंदी, जीएसटी से यूपीआई चार्ज तक, असली फायदा किसका?
देश के आर्थिक इतिहास में कुछ तारीखें ऐसी दर्ज हो चुकी हैं, जिन्हें चाहकर भी भुलाया नहीं जा सकता। ऐसी ही एक अनपेक्षित और झकझोर देने वाली घटना थी—अचानक हुई नोटबंदी। एक ही झटके में देश के कुल चलन का एक बड़ा हिस्सा रातों-रात कागज का टुकड़ा बन गया। सरकार की दलील थी कि इससे देश में समानांतर चल रही काले धन की अर्थव्यवस्था की कमर टूट जाएगी। लेकिन इस तुगलकी फरमान का खामियाजा देश के मेहनतकश और आम नागरिकों को भुगतना पड़ा। बैंकों और एटीएम के बाहर लगी लंबी और अंतहीन कतारों में खड़े-खड़े कई लोगों ने दम तोड़ दिया।
शादियों के ठीक मुहाने पर खड़े परिवारों को अपने ही पैसों के लिए दर-दर भटकना पड़ा, और शादियों की खुशियां आंसुओं में बदल गईं। शुरुआत में बड़े-बड़े दावे किए गए थे कि नोटबंदी के बाद देश का सारा काला धन बाहर आ जाएगा और विदेशों में जमा काला धन वापस लौटने पर हर देशवासी के बैंक खाते में पंद्रह-पंद्रह लाख रुपये आ जाएंगे। जनता ने इन वादों पर भरोसा भी किया, लेकिन कुछ समय बीतने के बाद सत्ता के शीर्ष से ही इसे एक जुमला करार दे दिया गया।
नोटबंदी के इस घाव के अभी निशान पूरी तरह मिटे भी नहीं थे कि देश पर वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) का एक नया बोझ लाद दिया गया। जीएसटी लागू करते वक्त भी यही राग अलापा गया था कि यह कर सुधार देश की अर्थव्यवस्था के लिए वरदान साबित होगा और इससे व्यापार करना बेहद आसान हो जाएगा। लेकिन कई साल बीत जाने के बाद सरकार को आखिरकार यह स्वीकार करना पड़ा कि इस जटिल कर प्रणाली की वजह से देश को फायदा कम और नुकसान ज्यादा हो रहा है।
छोटे और मध्यम वर्ग के व्यापारियों की रीढ़ टूट गई, कई व्यवसाय बंद हो गए और बेरोजगारी का ग्राफ ऊपर चढ़ गया। यह अपने आप में एक विरोधाभास है कि भले ही इस व्यवस्था ने आम जनता और छोटे कारोबारियों को भारी आर्थिक संकट में झोंक दिया हो, लेकिन दूसरी तरफ इससे केंद्र सरकार की झोली अत्यधिक धन से भर गई। जीएसटी भरने में होने वाले मामूली विलंब की वजह से लगने वाले भारी-भरकम दंड का कोई भी हिस्सा राज्यों के खाते में नहीं जाता, बल्कि वह सीधे केंद्र के खजाने में समा जाता है।
संघीय ढांचे की इस उपेक्षा ने राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता को कमजोर किया है। इन तमाम प्रशासनिक प्रयोगों के बीच अब अचानक यूपीआई लेनदेन पर भी अतिरिक्त चार्ज लगाने का एलान कर दिया गया है। देश को डिजिटल इकोनॉमी और कैशलेस बनाने का ढिंढोरा पीटने वाले लोग अब इस नए फैसले पर भी पर्दा डालने में जुटे हैं। अनेक मोदी समर्थक इस निर्णय को भी पहले की तरह एक और ‘मास्टर स्ट्रोक’ बताने में अपनी जरा भी शर्म महसूस नहीं कर रहे हैं। उनका तर्क है कि यह बोझ आम आदमी की जेब पर नहीं पड़ेगा, क्योंकि सरकार इसकी वसूली सीधे व्यापारियों से करेगी।
लेकिन अर्थशास्त्र के बुनियादी नियमों की समझ रखने वाला कोई भी आम आदमी यह जानता है कि व्यापारी अपनी जेब से कर या अतिरिक्त शुल्क की अदायगी नहीं करेगा। अंततः उत्पादन लागत, सेवा शुल्क या कर का यह पूरा बोझ घूम-फिर कर अंतिम उपभोक्ता यानी आम जनता के ही माथे पर मढ़ दिया जाएगा। जब यूपीआई जैसे लोकप्रिय और आम माध्यम पर 18 प्रतिशत की भारी-दर से जीएसटी और अन्य चार्ज जोड़े जाएंगे, तो इसका प्रत्यक्ष असर हर वर्ग के रोजमर्रा के बजट पर पड़ना तय है।
अब यह समझने के लिए किसी रॉकेट साइंस की जरूरत नहीं है कि इस तरह के फैसलों का वास्तविक आर्थिक बोझ किसे उठाना पड़ेगा। इन तमाम घटनाओं और फैसलों के बाद आज यह सवाल सबसे प्रासंगिक बन गया है कि आखिर इस किस्म के सारे सरकारी फैसले किसके फायदे के लिए लिए जा रहे हैं? क्या देश की आम जनता केवल नीतियों के नाम पर अंतहीन प्रयोगों की प्रयोगशाला बनकर रह गई है?
नोटबंदी से लेकर जीएसटी और अब यूपीआई तक के सफर ने यह साबित कर दिया है कि इन तमाम नीतियों के केंद्र में आम आदमी का कल्याण नहीं, बल्कि सरकारी तिजोरी को भरना या कॉर्पोरेट हितों साधना रहा है। यह तय है कि इस पूरी प्रक्रिया में देश के आम जनमानस को कोई प्रत्यक्ष फायदा नहीं मिलने वाला है। समय आ गया है कि देश की जनता इन आर्थिक नीतियों के दूरगामी परिणामों पर गहराई से विचार करे और नीति-निर्माताओं से उनके फैसलों की वास्तविक जवाबदेही तय करे। लगातार चुप्पी साधे रहने वाले लोग भी देश का भला नहीं कर रहे हैं। कमसे कम विरोध का स्वर तो सत्ता को बतायेगा कि उससे जनता नाराज है।